मैं आपके अखबार के माध्यम से लोगों का ध्यान समाज में फैली दहेज प्रथा की ओर आकर्षित करवाना चाहती हूं. आजकल हर दिन अखबार में दहेज उत्पीड़न का मामला प्रकाश में आ रहा है.
आज अगर किसी पिता को अपनी बेटी की शादी करनी होती है, तो पहले उसे दहेज के पैसों की व्यवस्था कर लेनी पड़ती है. लड़के की पढ़ाई और पेशे के हिसाब से उसकी कीमत लगायी जाती है. डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, प्रोफेसर, क्लर्क, चपरासी, शिक्षित बेरोजगार, अशिक्षित बेरोजगार, साक्षर, निरक्षर तक के लड़कों की कीमत तय है.
यदि निर्धारित कीमत से कम दहेज लड़की के पिता ने दिया, तो फिर उस लड़की की खैर नहीं. उसे प्रताड़ित करके मारने, मरने या घर से भागने तक को मजबूर किया जाता है. आखिर यह समाज किस दिशा में जा रहा है? क्या दहेज ही सबकुछ है?
प्रतिभा तिवारी, मधुपुर
