महल को चुना मनमोहन ने

।।एमजे अकबर।।(वरिष्ठ पत्रकार)सिनसिनातस की कहानी हर राजनीतिज्ञ को पढ़नी चाहिए. ईसा पूर्व 458 में रोम पर सैबिनी और एकी जनजाति ने हमला किया था. जब सिनसिनातस को राष्ट्र सेवा का संदेश मिला, वह खेत में हल चला रहा था. तानाशाह के तौर पर नियुक्त किये गये सिनसिनातस ने हमलावर सेना को पराजित किया. जीती गयी […]

।।एमजे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
सिनसिनातस की कहानी हर राजनीतिज्ञ को पढ़नी चाहिए. ईसा पूर्व 458 में रोम पर सैबिनी और एकी जनजाति ने हमला किया था. जब सिनसिनातस को राष्ट्र सेवा का संदेश मिला, वह खेत में हल चला रहा था. तानाशाह के तौर पर नियुक्त किये गये सिनसिनातस ने हमलावर सेना को पराजित किया. जीती गयी संपत्ति को सैनिकों में बांट कर वह अपने खेत पर लौट आया. उसका हल वहीं का वहीं पड़ा था. इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं था. वह सिर्फ 15 दिनों के लिए तानाशाह रहा था. रोम के किसी और शासक या तानाशाह ने नैतिकता का ऐसा आदर्श पेश नहीं किया. सत्ता के अलावा कोई और चीज शांति और सार्थकता दे सकती है, यह भावना शासकों के लिए अजनबी है. रोम के करीब 130 शासकों में से सिर्फ 28 ही बुढ़ापे या बीमारी से मरे. ज्यादातर तलवार के दम पर तख्त तक पहुंचे और उसी से मारे गये. नेता सत्ता की चमक से मोहित होते हैं. अवकाश का अकेलापन उन्हें डराता है.

भारत में कोई ताकतवर मंत्री स्वेच्छा से कुर्सी नहीं छोड़ता. मौजूदा संसद में अगर मंत्रियों को जवाबदेह ठहराया जाये, तो मंत्री बनने के लिए सांसदों का टोटा पड़ जायेगा. जवाहर लाल नेहरू एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने अवकाश लेने के बारे में सोचा था, वह भी 1957 में सफलता के शिखर पर खड़े होकर, न कि 1962 के चीन युद्ध में हार का मुंह देखने के बाद. नेहरू की इच्छा की वजह इतनी मानवीय थी कि उसे अतिसाधारण कहा जा सकता है. वे पढ़ना, लिखना और अपने परिवार के साथ वक्त बिताना चाहते थे. कहा जाता है, हर राजनीतिक कथा का अंत त्रसदी में होता है. नेहरू के लिए यह घड़ी 1962 में आयी.

कुछ भी हो, राजनीति से मजबूरी का लोप नहीं हुआ है. जनमत सर्वेक्षणों, देखे-सुने साक्ष्य बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जादू खत्म हो गया है और अब वे बोझ नजर आने लगे हैं. 2009 में वे लोकप्रियता के जिस शिखर पर थे, उसे देखते हुए यह फिसलन हैरान करनेवाली है. शायद उन्होंने उम्मीदों को इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था कि वहां से वे सिर्फ नीचे ही आ सकते थे. लेकिन, तथ्य जिस बिंदु पर मजबूत होते दिख रहे हैं, वहां उन्हें बदलना मुश्किल लगता है. एबीपी न्यूज के सर्वे के मुताबिक प्रधानमंत्री पद की रेस में नरेंद्र मोदी 47 प्रतिशत समर्थन के साथ औरों से मीलों आगे हैं. राहुल गांधी को सिर्फ 18 प्रतिशत समर्थन मिला है. मनमोहन सिंह तसवीर में भी नहीं हैं. कांग्रेस समर्थकों को दलों के बीच की दूरी ज्यादा परेशान कर सकती है. सर्वे में भाजपा को 36 प्रतिशत समर्थन मिलने की बात की गयी है, जबकि कांग्रेस को 22 फीसदी. ध्यान रखिए कि भाजपा का आधार संकुचित है, इसलिए यह समर्थन जहां भी होगा, काफी गहरा होगा.

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, सत्ताधारी पार्टी को संकट की ऐसी घड़ी में रुकने और चीजों को दुरुस्त करने का मौका देती है. वह सरकार गंवाये बगैर प्रधानमंत्री को बदल सकती है. श्रीमती शीला दीक्षित अच्छी पसंद हो सकती हैं. वे यूपीए-2 द्वारा पैदा किये गये प्रशासनिक और राजनीतिक शून्य को भर सकती हैं. आखिर कांग्रेस यथास्थिति में क्यों यकीन करती है? इसके पीछे जरूर कोई कारण होगा. सोनिया गांधी राहुल गांधी के अलावा किसी और को उत्तराधिकारी बनाने के बारे में नहीं सोच सकतीं और राहुल गांधी खुद को यह जिम्मेदारी लेने लायक नहीं मानते हैं. इसलिए कांग्रेस की पूरी रणनीति राहुल गांधी को संकट से पार लगाने में सक्षम नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने के बजाय शीर्ष पद के लिए भाजपा के उम्मीवार को नष्ट करने पर टिक गयी है. यह वार उल्टा पड़ सकता है. मतदाताओं ने शायद मोदी के बारे सारी नकरात्मक बातों पर विचार करने के बाद ही फैसला लिया है.

गुजरात दंगों के लिए जवाबदेही के वृत्तांत में नया जोड़ने लायक कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ है. अगर राहुल गांधी का सार्वजनिक कद नहीं बढ़ता है या अनिश्चित रहता है, तो चुनाव के वक्त कांग्रेस के तर्क हवा में उड़ जायेंगे. अनिश्चितता का नतीजा सबसे खराब होगा. अगर कांग्रेस सवालों के जवाब नहीं देती, तो वह आमतौर पर विपक्ष की पहचान रही बीमारी का शिकार हो सकती है. उम्र और रिकॉर्ड, दोनों ही तीसरे टर्म के लिए मनमोहन सिंह की उम्मीदवारी को खारिज करते हैं. अनिश्चय में पड़े मतदाताओं को लुभाने का एकमात्र तरीका राहुल गांधी की खासियतों को बताना ही हो सकता है.

2009 में मनमोहन सिंह आज की तुलना में काफी युवा थे. वे पिछले पांच वर्षो में एक दशक से ज्यादा बूढ़े हो गये हैं. दोबारा चुने जाने के बाद अपने पहले प्रेस कांफ्रेंस में वे काफी सकारात्मक और विश्वास से लबालब नजर आये थे. उन्होंने सहजता से राहुल गांधी के बारे में पूछे गये निश्चित सवाल को चलता कर दिया था. उन्होंने कहा था, राहुल गांधी जब चाहें, वे इस्तीफा देने को तैयार हैं. लोग मुस्कुराये थे और अपने काम में लग गये थे. अगर मनमोहन सिंह ने 2009 में या 2010 में पद छोड़ दिया होता, तो आज उनको वापस लाने के लिए एक राष्ट्रीय मांग हो रही होती. उनके पांच साल के कार्यकाल को स्वर्णयुग कह कर याद किया जा रहा होता. सिनसिनातस के 15 दिन के शासन की तरह. लेकिन डॉ सिंह ने खेत की जगह महल चुना.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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