आज की व्यवस्था कितनी चरमरायी हुई है, इसका एक उदाहरण हम भारतीय रेल में रोजाना देख सकते हैं. सवारी गाड़ियों में सवारी से ज्यादा कोयला या लकड़ियां दिखायी पड़ती हैं.
यात्री टिकट लेकर सुविधाजनक यात्र के लिए अपना हक लेता है, पर डिब्बे के अंदर जाते ही कोयले की धूल उसका स्वागत करती है और उस कोयले के स्वामी के चेहरे पर एक भय और सिहरन के बजाय एक अजब का आत्मविश्वास रहता है. और उस आत्मविश्वास का कारण होता है – उपहारस्वरूप दिया गया 60 रुपया, जो किसी पुलिस का पॉकेट गर्म किये हुए होता है.
यह अनुभव आप रोज धनबाद से रांची आ रही पैसेंजर पर ले सकते हैं. बीच-बीच में पुलिसवालों का डंडा उठता है पर जेब गर्म कर बैठ जाता है. सोचती हूं कि आखिर वो डंडे उठे क्यों थे? उस गैरकानूनी काम को रोकने के लिए या 60 रु पयों के लिए! शारदा कुमारी, रांची
