।।कमलेश जैन।।
(अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)
तलाक के बाद एक औरत की जिंदगी बहुत कड़े इम्तिहान से होकर गुजरती है. कभी-कभी तो समाज में उसकी स्थिति ऐसी बन जाती है कि उसका जीना ही मुहाल हो जाता है. और अगर साथ में बच्च भी हो तो उसके लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. इस ऐतबार से पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों के अधिकार को सुनिश्चित करनेवाले विवाह (संशोधन) विधेयक-2010 के इस सप्ताह राज्यसभा से पास हो जाने से तलाकशुदा औरतों के मनोबल में बढ़ोतरी आयेगी. उन्हें कम से कम इस बात का डर नहीं होगा कि अगर तलाक की नौबत आयेगी, तो उसके बाद वे क्या करेंगी. अगर साथ में बच्च भी है तो उसे किस तरह पालेंगी.
मौजूदा दौर में पैसा बहुत ही मायने रखता है. थोड़ा सा पीछे जाइए और गौर कीजिए कि जब इस तरह के कानून नहीं थे, तब तलाकशुदा औरतों की जिंदगी कितनी दूभर होती थी. कुछ भी निश्चित नहीं होता था कि तलाक के बाद वे कहां जायेंगी और क्या करेंगी. जो औरतें समृद्ध होती थीं, उनके लिए तो तलाकशुदा जिंदगी भी सामान्य ही रहती थी, लेकिन गरीब महिलाओं के लिए यह किसी अभिशाप से कम नहीं होता था. ऐसे में पैसे के अभाव में उन्हें अपने मायकेवालों के रहमो-करम पर रहना पड़ता था और वहां भी उन्हें लोगों के तानों का शिकार होना पड़ता था. उनकी सामाजिक स्थिति दोहरे मानदंड और भेदभाव का शिकार हो जाती थी. नया कानून लागू होने के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा.
एक आंकड़े के मुताबिक देश में तकरीबन 98 प्रतिशत चल-अचल संपत्ति पर सिर्फ पुरुषों का अधिकार है. सवाल उठता है कि आखिर क्यों? इसी सवाल के मद्देनजर अब कानून के जरिये समझा गया है कि आधी आबादी को भी संपत्ति में आधा हिस्सा मिलना चाहिए. आधा न भी मिले, तो इतना तो जरूर मिले कि तलाकशुदा महिलाएं अपनी जिंदगी को किसी और के सहारे के बिना भी आसानी से गुजार सकें. तलाक के बाद महिलाओं को संपत्ति में कानूनी अधिकार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. उनके अंदर आत्मविश्वास आयेगा. साथ ही पतियों पर भी इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वे घर के भीतर के छोटे-मोटे विवादों के लिए तलाक लेने कोर्ट न पहुंच जायें.
आये दिन हमें ऐसी खबरें पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं कि महिलाएं अपने घरों में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकार हो रही हैं. उनके पास कोई सार्थक अधिकार नहीं होने से वे इसे सहती रहती हैं. नया कानून बनने से वे अपने खिलाफ होने वाले अत्याचार के खिलाफ और अपने पति से दूरी बनाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकेंगी. जाहिर है कि औरतों के सोशल स्टेटस को बढ़ाने और उसे मजबूत करने में यह कानून एक महत्वपूर्ण योगदान देनेवाला साबित हो सकता है.
हर कानून के कुछ सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ कुछेक नकारात्मक पहलू भी होते हैं. नकारात्मक पहलुओं के कारण ही कानूनों में संशोधन की व्यवस्था है. इस व्यवस्था के तहत ही एक संशोधित बिल लाया गया है. इस संशोधित बिल पर भी कुछ उंगलियां उठ रही हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यही उठाया जा रहा है कि तलाक के बाद पति की संपत्ति में से पत्नी को अधिकार दिये जाने से वे छोटे-मोटे विवाद पर भी तलाक की मांग करेंगी. अगर ऐसा होता है तो जाहिर है कि इससे पुरुषों को बहुत नुकसान होगा. लेकिन इस पहलू के मद्देनजर ही कानून में अदालतों को अधिकार दिये गये हैं कि कितनी संपत्ति देनी है, इसका फैसला अदालतें वस्तुस्थिति को समझ कर करें.
इस फैसले के बाद अगर पत्नी को लगेगा कि उसे कम मिला है, तो वह उच्च अदालतों में इसे चुनौती दे सकेंगी. एक और सवाल है कि पति से पटरी न बैठने पर उससे तलाक लेकर पत्नी किसी और के साथ पुनर्विवाह करना चाहे तो पहले पति की संपत्ति से हिस्सा मिलना चाहिए या नहीं? ऐसे मुद्दों को भी अदालतों के विवेक पर छोड़ दिया गया है. अदालत उनके सभी पहलुओं पर गौर कर अपने विवेक से फैसला दे सकती है.एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है. यहां विवाह को लेकर सभी धर्मो की मान्यताएं अलग-अलग हैं. तलाक की परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं. इसलिए सवाल उठता है कि क्या यह कानून सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने में सक्षम है? इस पर यही कहा जा सकता है कि ऐसे कानून देश की सभी औरतों के लिए होने चाहिए और यदि धर्म इसमें दखल देते हैं तो औरतों को चाहिए कि वे अदालतों का सहारा लेकर अपने हक की लड़ाई लड़ें.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
