।। परवेज आलम ।।
(प्रभात खबर, भागलपुर)
ये बात हैरत में डालने वाली थी कि मेरे दोस्त ने शायरी से तौबा कर ली है. घोड़े ने घास खानी कैसे छोड़ दी! शेर कहना और फिर मुझ जैसे गैर–साहित्यिक व्यक्ति को भी जबरन सुनाना तो उसकी फितरत थी. फिर अचानक से क्या हुआ? हकीकत जानने जनाब के घर पहुंचा, तो वहां का दृश्य हृदय–विदारक था.
दोस्त अपने कमरे में चारों तरफ बिखरे कागज के टुकड़ों के बीच गमगीन बैठा था. वह इस हसरत से उन्हें देख रहा था, जैसे कह रहा हो कि ‘अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें.’ हालांकि उसकी शायरी से निजात मिलने के एहसास मात्र से मैं खुश हो रहा था.
दोस्त कुछ कहने के बजाय सोशल नेटवर्किग साइटों को कोसने लगा–मियां फेसबुकिया शायरों ने ऐसे हालात बना दिये हैं कि अब शायरी शरीफों का शौक नहीं रह गयी. ऐसा लगता है, देश का बच्चा–बच्चा शायर बन गया है.
लोग कोई भी जुमला अपनी दीवार पर साट देते हैं. बात अपनी ही दीवार तक नहीं रहने देते, दुनियाभर के दोस्तों को पढ़वाते हैं. अमां कुछ तो इतने ढीठ हैं कि इसे पसंद करने व कमेंट करने की हिदायत भी करते हैं. तुर्रा यह कि कमेंट खुश करनेवाला चाहिए़ टोका–टाकी करो तो बुरा मानते हैं. एक साहब की वाहियात–सी गजल में बहर की खामी पर कमेंट किया, तो खफा हो गय़े.
कहने लगे बहर–वहर आप जानिए, बात समझ में आ गयी इतना काफी है. एक मोहतरमा ने हद कर दी. शेर में वजन की खामियां देख सुधार की गरज से कमेंट लिखा, तो आगबबूला हो गयीं. फौरन जवाब भेजा–मैं शायरा हूं, गली–गली घूम कर सब्जी–भाजी नहीं बेचती. अमा हद हो गयी.
यहां एक–एक शेर कहने और उसे दुरुस्त करने में हफ्तों लग जाते हैं, फिर भी उस्ताद खामी निकालते हैं. लेकिन, सोशल साइट पर भाई लोग घंटे–घंटे में पूरी की पूरी नयी गजल पोस्ट करते रहते हैं.
दोस्त सोशल साइटों के दूसरे पहलुओं में भी कीड़े निकालने लगा. कीड़े निकालने की गति मिड–डे मील के कीड़ों से भी अधिक थी. कहने लगा– समाज का ताना–बाना भी तार–तार हो रहा है. घर में बूढ़ी मां बीमार पड़ी है और बेटा है कि सोशल साइट पर बनाये गये अनदेखे दोस्तों की खैरियत की फिक्र में दुबला हुआ जा रहा है.
बेगम के सिर में दर्द है, पर मियां मोबाइल लेकर दुनिया–जहान के दोस्तों का सिर खा रहा है. एक वाकया सुनाता हूं, फिर फैसला करना कि क्या अच्छा, क्या बुरा.
कल शाम एक चायखाने में दो नौजवान बात कर रहे थ़े एक बोला जानते हो, कल इंटरनेट काम नहीं कर रहा था. कुछ देर अपने घरवालों के साथ बैठने का मौका मिला. पता चला कि सभी अच्छे लोग हैं! इससे पहले कि दोस्त आगे कुछ कहता– मैं वहां से निकल पड़ा. मैं उलझन में हूं. फैसला आप पर छोड़ता हूं.
