ओछो मंत्री राजय नास

चंचल सामाजिक कार्यकर्ता दो नीतियों पर चर्चा नहीं होती. एक खेती नीति और दूसरा औद्योगिक नीति. उद्योगपति उसका फायदा ले रहा है और किसान जलालत ङोल रहा है. इसके लिए भी तुम दोषी हो. किसको चुन कर भेजते हो, यह देख लो, तो सब समझ में आ जायेगा. बात तब की है जब कलकत्ता, कोलकता […]

चंचल
सामाजिक कार्यकर्ता
दो नीतियों पर चर्चा नहीं होती. एक खेती नीति और दूसरा औद्योगिक नीति. उद्योगपति उसका फायदा ले रहा है और किसान जलालत ङोल रहा है. इसके लिए भी तुम दोषी हो. किसको चुन कर भेजते हो, यह देख लो, तो सब समझ में आ जायेगा.
बात तब की है जब कलकत्ता, कोलकता न भावा रहा. बिसेसर भगत क मङिाला लड़िका पहली दफा गांव में कलकत्ता ले आवा रहा. तब गांव के लोग बहुत कुछ नहीं देखे थे और न ही उसके बारे में जानते थे. जैसे माचिस, रेडियो. इ दोनों चीजें सिरी तेवारी के साथ गांव आया. एक दिन जब तिउराइन ने फुक्ती से एक डिब्बी निकाल के कांडी रगड़ी और फक्क से लौ निकल आवा, तो अक्खा गांव क मुंह भक्क से खुल गया.
छोटकी कहाईन ने अंचरा जमीन पे टिकाय के अग्नी महराज के पैलगी की, तो गोड़फूलना दादी ने असीस दिया- मनई मौत से हारा बा. बाकी का बचा है. जब तक तिउराइन जिंदा रहीं, माचिस को अंगार डिबिया ही बोलती रहीं. और ‘बाजा’- मेरा मन डोले, मेरा तन डोले.. अक्खा गांव तेवारी के मड़हा में बैठा बगैर ढोल मजीरा के गाना सुनता रहा और अपने अंदर के सवाल से जूझता रहा.
आज कलकता कोलकता हो गया और हमारा गांव शहर के कचरे से भर गया. रामलालवा की दूकान पर प्लास्टिक से बंद हर सामान बिकने के लिए तैयार है. डिब्बा हर घर में है. रानी मुखर्जी गन्ने के खेत में कुरकुरे खा रही है. उमर क छोटका लड़िका धन्ना गया है. कुरकुरे खाये बिना इस्कूल ना जाब.
इस तरह गांव दोहरी मार ङोल रहा है. कयूम मियां ने लंबी सांस ली. लाल्साहेब ने अंजुरी आंख पे टिका के घुमड़ते बादल को निहारा-पता नहीं का होवे वाला बा? चैत में बारिश, रात में रजाई? कहत रहे कि मत जिताव एका? सब अनर्थ होत बा. उमर दरजी बोले- घाघ ऐरा-गैरा ना रहे, कल रामदीन पंडित सुनावत रहे कि जहां क राजा व्यापारी, उहां क जनता भिखारी.. लखन कहार को घाघ की याद आ गयी- घाघ कहें हैं- शुक्रवार की बादरी, रहे शनीचर छाय/ कहे घाघ सुन भड्डरी, बिन बरसे ना जाय. बारिश तो हो के रहेगी. सारी तैयार फसल जो कुछ बची रही, वो भी गयी. आगे का भी कुछ भरोसा मत रखो.
चिखुरी धीरे से गुनगुनाये- एक बूंद जो चैत में गिरे, सहस्र बूंद सावन की हरे.
नवल उपधिया ने चुटकी काटा- इसीलिए तो सरकार नयी-नयी तरकीब निकाल रही है. कितनी भली सरकार है. सरकार को सब मालुम है कि अब खेती बेकार की चीज है. अब जमाना बदल गया है. किसानी छोड़ो, शहर बस रहे हैं वही चलो. खेती में कुच्छो ना है. इसीलिए सरकार जमीन ले रही है और बिकास दे रही है. कहो कीन उपाधिया? कीन भाजपाई हैं. उनको छेड़ो तो तुनक जाते हैं.
कीन ने सफाई दी- अच्छे स्कूल, अच्छे हस्पताल, बड़े कारखाने, बेरोजगारी का खात्मा करना है, तो जमीन तो चाहिए ही. अधलेटे चिखुरी उठ कर बैठ गये- एक बात बता कीन! इस देश में हस्पताल हैं कि नहीं, उनकी क्या हालत है? गांव-गांव तक सरकारी मदरसे हैं उन्हें देख लो. कैसे चल रहे हैं? उनके बारे में मन की बात क्या बोलता है. कमीनगी की हद होती है. यह खेती और गांव का मुल्क है और तुम गांव उजाड़ कर ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की बात करते हो? गांव की जमीन पर अदानी-अंबानी कारखाना खोलेंगे, तो तुम्हे क्या मिलेगा? नौकरी? कौन सी नौकरी? अपने घर-गांव के बच्चे को देखो, कितने इंजीनियर हैं? अपनी खेती करो, कुटीर उद्योग से जुड़ो.. चले हैं बिकास समझाने?
लाल्साहेब ने नया सवाल उठाया- चिखुरी काका! खेती कैसे करें? जानवर से मनई से तो खेती बच सकती है, लेकिन ऊपर वाले से कैसे बचेगी. खूब बचेगी. कह कर चिखुरी ने लंबी सांस ली. मौसम को हमने बिगाड़ा है, उसे ठीक करो. आधी खेती आधी बाग. पुरान कहावत रही. कितनी बाग बची है? कितने तालाब बचे हैं.
कुएं गायब हो रहे हैं. जंगल काटे जा रहे हैं. औजार बढ़ेगा तो गुलामी बढ़ेगी और हाथ खाली होंगे तो कटेंगे. और सबसे बड़ी बात देश की खेती नीति क्या है? किसी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है. क्योंकि ये कलमघिस्सू ‘मैकाले की नाजायज औलादें’ हैं, जो एसी कमरों में बैठ कर खेती नीति तैयार करते हैं. सब्जियों के दाम पर, किसान के उत्पाद के दाम पर तो हल्ला बोलोगे, कभी कारखाने के उत्पाद की कीमत पर भी तो कुछ बोलो. अब हर खेती को कम से कम आधी जमीन पर पाली हाउस और ग्रीन हाउस तो दो..
इस मुल्क में दो नीतियों पर चर्चा नहीं होती. एक खेती नीति और दूसरा औद्योगिक नीति. इसे समझो. उद्योगपति उसका फायदा ले रहा है और इसके बरक्स किसान जलालत ङोल रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है, उसके लिए भी तुम दोषी हो. किसको चुन कर भेजते हो, यह देख लो तो सब समझ में आ जायेगा. चलो घाघ को सुन लो- ओछो मंत्री राजय नास, तालाब बिनासे काई/ सान साहिबी फूट बिनासे, घग्घा पैर बेवाई// मतलब? अपने बाप से पूछो..
इ तो ज्यादती है चिखुरी काका.. इ होत बा बे, मंत्री का-का बोलि रहे हैं, सुनत बाते की नाय? और चौराहे की संसद उठ गयी. नवल गाते हुए जाते देखे गये.. चैत मास चुनरी रंगैबो हो रामा, पिया घर अइहैं..

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