शौचालय के लिए मुखर होतीं महिलाएं

हर परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं में शौचालय का अहम स्थान है. लेकिन भारत जैसे कुछ विकासशील देशों की यह विडंबना रही है कि यहां न सरकार और न ही जनता में शौचालय निर्माण को लेकर प्रतिबद्धता रही. नतीजन, पूरा देश शौचालय की कमी से जूझ रहा है. हाल ही में सामने आये यूनिसेफ के आंकड़ों […]

हर परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं में शौचालय का अहम स्थान है. लेकिन भारत जैसे कुछ विकासशील देशों की यह विडंबना रही है कि यहां न सरकार और न ही जनता में शौचालय निर्माण को लेकर प्रतिबद्धता रही. नतीजन, पूरा देश शौचालय की कमी से जूझ रहा है.
हाल ही में सामने आये यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और ओड़िशा जैसे राज्यों के लगभग 70 प्रतिशत से अधिक घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है. आर्थिक रूप से विपन्नता, विपरीत मानसिकता और जागरूकता का अभाव इन प्रदेशों में शौचालयों की महत्ता को दोयम दर्जे की चीज बना देती है.
यूं तो खुले में शौच करने में हर कोई असहज महसूस करता है, लेकिन महिलाओं और बच्चियों को अपेक्षाकृत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. उन्हें हमेशा अनहोनी का डर सताता रहता है. पिछले दिनों बलात्कार और यौन प्रताड़ना की कई घटनाएं घटीं, तो खुले में शौच जाना ही प्रमुख कारण बन कर सामने आया. ऐसे में मन में डर होना स्वाभाविक है.
दूसरी तरफ, खुले में शौच के कारण ही दर्जनों संक्र ामक बीमारियां अनचाहे रूप से इन महिलाओं और इनके होने वाले बच्चों को प्रभावित कर रही होती हैं. लेकिन यह सुकूनदेह है कि अब कुछ महिलाएं खुद जागरूक होकर शौचालय निर्माण की आवाज को बुलंद कर रही हैं.
जरूरी है कि महिलाएं अपने घर के पुरुषों को शौचालय की उपयोगिता तथा इसके बिना होने वाली परेशानियों को बतायें. उन पर शौचालय निर्माण के लिए सकारात्मक दबाव बनायें. तब जाकर कुछ बात बनेगी. उम्मीद है कि शौचालय की मांग को लेकर महिलाएं और मुखर होंगी, जिससे हालात बदलेंगे.
सुधीर कुमार, गोड्डा

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