बापू का निर्मल गांव

आज के जमाने में भी गांधी कितने प्रासंगिक हैं. उनके विचार, स्वच्छ-निर्मल गांव की धारणा, पढ़िये यह कविता : गांधी उस गांव का नाम/ जहां बसता था तन लुभाता सूरज/ जहां रहती थी मन चुराती शाम/ जहां बहती थी बस ताजी हवाएं/ और रहते थे लोग सद्कर्मो में मन बसाये/ जहां धरती थी चुनर में […]

आज के जमाने में भी गांधी कितने प्रासंगिक हैं. उनके विचार, स्वच्छ-निर्मल गांव की धारणा, पढ़िये यह कविता : गांधी उस गांव का नाम/ जहां बसता था तन लुभाता सूरज/ जहां रहती थी मन चुराती शाम/ जहां बहती थी बस ताजी हवाएं/ और रहते थे लोग सद्कर्मो में मन बसाये/ जहां धरती थी

चुनर में सजती/ जहां गंगा में पावनता थी झलकती/ जहां बदन-सी कोमल थी माटी/ जहां चिड़िया की थी राग बजाती/ और थी जन्नत-सी हर काम/ गांधी हैं उस नव-सद्सोच का नाम/ अब हमें भी वही करना है/ इस विनाशी काल से लड़ना है/ पेड़ों से धरा को भरना है/ कचरे को अब दूर करना है/ अकेले नहीं सबको साथ ले चलना है/ एक नये पर्यावरण का रास्ता गढ़ना है/ बस वीरों की राह में हमको ढलना है/ और गर्व से बस यही कहना है/ ये हैं गांधी सोच का परिणाम/ यह है मेरे ‘बापू का निर्मल गांव’.

रवि कुमार गुप्ता, केंद्रीय विवि ओडिशा

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