भारतीय रेल में सुधार से संबंधित दो महत्वपूर्ण रिपोर्टे पिछले दिनों सरकार को सौंपी गयी हैं. रेल में वाणिज्यिक अधिकारों की समीक्षा के लिए प्रसिद्ध मेट्रो रेल प्रशासक इ श्रीधरन की एक सदस्यीय समिति गठित की गयी थी, जबकि ढांचागत सुधार संबंधी सुझाव के लिए एक पैनल अर्थशास्त्री व नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के नेतृत्व में बनाया गया है.
श्रीधरन समिति ने रेलवे में वाणिज्यिक अधिकारों के विकेंद्रीकरण पर जोर दिया है. उसके मुताबिक केंद्रीकृत स्तर पर की जानेवाली खरीदों का जिम्मा क्षेत्रीय रेल प्रबंधनों को सौंप देना चाहिए. ऐसा करने से 10 हजार करोड़ रुपये की सालाना बचत की उम्मीद है. खरीद के केंद्रीकृत तंत्र की वजह से पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार व्याप्त है और अधिकारियों व विक्रेताओं की मिलीभगत से संगठित एवं विस्तृत गिरोह सक्रिय हैं.
श्रीधरन ने यह भी रेखांकित किया है कि रेलवे बोर्ड का गठन नीतियां, योजनाएं, रेल प्रबंधन के व्यापक सिद्धांत और नियम बनाने तथा रेलवे का मार्गदर्शन करने के लिए किया गया था, लेकिन संस्था इन कर्तव्यों को पूरा नहीं कर रही है. विडंबना है कि सबसे अधिक डीजल खरीदनेवाली संस्था रेलवे ने इस संबंध में ठेके का 15 सालों से नवीनीकरण नहीं किया है. यही स्थिति अन्य जरूरी वस्तुओं की खरीद में भी है. रेलवे की शोध-संस्था रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्डस ऑर्गेनाइजेशन का काम विक्रेताओं से लेन-देन और ठेकों की पड़ताल भर रह गया है.
उधर, देबरॉय के नेतृत्ववाले पैनल ने ट्रेनों के संचालन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और कल्याणकारी भूमिकाओं- स्कूल, अस्पताल तथा रेलवे सुरक्षा बल चलाना आदि- को बंद करने की सलाह दी है. उल्लेखनीय है कि हाल के दशकों में रेलवे की समीक्षा के लिए जितनी समितियां बनी हैं, शायद ही किसी दूसरी संस्था के लिए बनी होंगी, लेकिन दुर्भाग्य से उनके ज्यादातर सुझाव अमल के इंतजार में सरकारी अलमारियों में बंद हैं.
रेलवे की सूरत बदलने के लिए महत्वपूर्ण सुझावों पर विचार-विमर्श कर उन्हें लागू करना जरूरी है. अब देखना यह है कि सरकार हालिया रिपोर्टो पर कोई सकारात्मक पहल करती है या इनकी नियति भी पिछली रिपोर्टो की तरह ही होगी. घाटे में चलती रेल का भविष्य सरकार के रवैये पर निर्भर करेगा.
