झारखंड में नयी सरकार बनने के बाद राज्य आवास बोर्ड अचानक सक्रिय हो गया है. यह अच्छी बात है. बीते 14 सालों में आवास बोर्ड पर नजर रखनेवाला कोई नहीं था. बुधवार को नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने जब समीक्षा की, तो पता चला कि बोर्ड की 22 एकड़ जमीन पर कब्जा है.
वह भी सिर्फ कडरू इलाके में. अगर पूरा सर्वेक्षण किया जाये तो पता चलेगा कि रांची, जमशेदपुर या अन्य शहरों में कितनी जमीन पर कब्जा है. सवाल है कि जब बोर्ड ने जमीन का अधिग्रहण किया था, मुआवजा दिया था, तो कागजी काम पूरा क्यों नहीं किया था? जमीन को अपने कब्जे में क्यों नहीं लिया था? बोर्ड की जमीन पर अब बड़ी-बड़ी इमारतें बन चुकी हैं. 40 साल बाद नींद खुली है.
ऐसे में परेशानी तो होगी ही. तब के अधिकारी तो अब नौकरी में भी नहीं होंगे. किस पर कार्रवाई होगी? यह सारा मामला सिस्टम का है, जो चौपट है. आवास बोर्ड का गठन हुआ था कि लोगों को सस्ते मकान मिलेंगे. लेकिन बोर्ड ने आम लोगों को मकान देने का काम बाद में नहीं किया. हां, रसूखदार लोगों को मिलता रहा. जो बड़े अधिकारी हैं या थे, वे मकान और जमीन लेते गये. अब पकड़े जा रहे हैं. यह काम पहले होना चाहिए था. पर देर आये, दुरुस्त आये. सरकार अब योजना बना रही है.
अगर झारखंड में आवास बोर्ड और जमीन तलाश रहा है, तो उम्मीद बनती है. लेकिन इसे जमीन पर उतारना होगा. जरूरतमंद लोगों को कम कीमत पर मकान मिल जाये तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है. पड़ोस के उत्तर प्रदेश में आवास बोर्ड ने बेहतरीन काम किया है. ऐसा झारखंड में भी हो सकता है. अब कांप्लेक्स बनाने की योजना बन रही है. इसमें कम आयवालों के लिए भी व्यवस्था होगी. इसलिए यही समय है जब बोर्ड को सक्रिय किया जाये. नयी-नयी योजनाओं को धरातल पर उतारा जाये.
जो भी आबंटन हो, उसमें पारदशिर्ता हो, ताकि लोगों में बोर्ड पर विश्वास जागे. रांची में जमीन की गंभीर समस्या है. इसलिए अगर आवास बोर्ड योजना बना कर, खुद जमीन का अधिग्रहण कर, योजनाबद्ध तरीके से कॉलोनी बसाता है, तो इससे सबको सुविधा होगी. बोर्ड अपने मूल काम (यानी आवास बनाने व आवंटित करने) में जुट जाये, तो इससे आवास की समस्या कुछ हद तक जरूर सुलङोगी.
