फेल नहीं करने की नीति बदले सरकार

वर्ष 2009 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 क के तहत 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लिए एक कानून पारित किया गया. इसके तहत 6-14 वर्ष आयु के सभी बच्चों का नामांकन प्राथमिक कक्षाओं में अनिवार्य बनाया गया. साथ ही कक्षा एक से आठ तक फेल नहीं करने का […]

वर्ष 2009 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 क के तहत 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के लिए एक कानून पारित किया गया. इसके तहत 6-14 वर्ष आयु के सभी बच्चों का नामांकन प्राथमिक कक्षाओं में अनिवार्य बनाया गया.
साथ ही कक्षा एक से आठ तक फेल नहीं करने का भी प्रावधान लाया गया. शत-प्रतिशत नामांकन व स्कूल में ठहराव पर विशेष ध्यान देने से लगभग 97 प्रतिशत तक नामांकन तो प्राथमिक विद्यालयों में हो गया, लेकिन ‘नो रिटेंशन पॉलिसी’ के तहत कक्षा में पढ़ाई में कमजोर बच्चों को भी अगली कक्षा में प्रमोशन दे देने से उनकी क्षमता में धीरे-धीरे कमी आती गयी. इस ओर कानून लागू होने के छह वर्ष बाद सरकार का ध्यान आकृष्ट हो पाया है.
हाल ही में शिक्षा नीति को लेकर दिल्ली में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों एवं सचिवों की एक बैठक बुलायी गयी थी. कई राज्यों ने ‘नो रिटेंशन पॉलिसी’ का विरोध किया. वर्ष 2013 में संसद की स्थायी समिति द्वारा भी इस प्रावधान में बदलाव लाने की सिफारिश की गयी थी, परंतु सरकार ने इस पर खास ध्यान नहीं दिया.
सिर्फ नामांकन एवं ठहराव से प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं होगी, इसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाना भी जरूरी है. वरना सिर्फ डिग्री ले लेने से रोजगार नहीं मिल जायेगा. 2020 तक हमारा देश उच्च शिक्षा के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा, लेकिन रोजगार की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी.
कौशल विकास के बिना शिक्षित बेरोजगारी जारी रहेगी. प्राथमिक शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए विद्यालयों में शिक्षकों के पद भरने होंगे, उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यो से हटाना होगा व नो रिटेंशन पॉलिसी बदलनी होगी. तभी सुशिक्षित होगा देश हमारा.
संजय चंद, हजारीबाग

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >