भूमि अधिग्रहण बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के लिए लंबे समय से संवेदनशील मसला रहा है. इसे लेकर इन राज्यों में तेज और उग्र आंदोलनों का इतिहास कोई ज्यादा पुराना नहीं है. भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में अध्यादेश के जरिये संशोधन के खिलाफ झारखंड में जिस राजनीतिक गोलबंदी की हलचल पिछले दिनों शुरू हुई थी, अब वह जमीन पर दिखायी देने लगी है.
सोमवार को झामुमो की अगुवाई वाले विपक्ष ने राजभवन के सामने ‘महाधरना’ दिया. यह धरना कई मुद्दों को लेकर दिया गया, जिसमें भूमि अधिग्रहण एक अहम विषय था. इसी दिन राजधानी रांची में ही, भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार द्वारा किये गये ‘जन विरोधी’ बदलावों के खिलाफ और कई अन्य मुद्दों को लेकर नवगठित ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआइपीएफ) का कन्वेंशन हुआ. एआइपीएफ के जरिये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) जन आंदोलनों से जुड़े विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटी है.
यह भी खबर है कि 23-24 जनवरी को प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली में धरना देने वाले हैं. अन्ना के समर्थन में सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी है. पिछले दिनों दिल्ली में भाजपा की करारी हार से विपक्ष का मनोबल बढ़ा है. उसके मन में यह यकीन पैदा हुआ है कि अगर विपक्षी गोलबंदी एक जगह हो तो मोदी का रथ रोका जा सकता है. विपक्ष को लग रहा है कि जमीन अधिग्रहण को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ किसानों, आदिवासियों को आसानी से गोलबंद किया जा सकता है.
और अगर विपक्ष ऐसा कर रहा है, तो इसमें कुछ गलत भी नहीं है. हमारे लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी यही है. मोदी सरकार औद्योगीकरण और विकास के लिए जमीन की जरूरत बताते हुए जो अध्यादेश लेकर आयी है उसमें रैयत की सहमति के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है. किसानों, आदिवासियों के लंबे संघर्ष के बाद, जमीन अधिग्रहण के लिए बना अंगरेजों के जमाने का काला कानून मनमोहन सरकार के समय बदला था. लेकिन मोदी सरकार जो अध्यादेश लेकर आयी है, वह पुराने काले कानून की याद दिला रहा है. ऐसे में आंदोलन की राह बनती दिख रही है.
