संवैधानिक निरंकुशता के खतरे

महज एक साल के अंदर ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में फिर से फेरबदल करने पर आमादा हो गयी, वह भी अध्यादेश के जरिये? इसका एक ही मकसद दिखता है, चुनिंदा बड़े औद्योगिक घरानों और देसी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाना! केंद्र के लिए इन दिनों गुजरात नहीं, राजस्थान ‘सुधार और […]

महज एक साल के अंदर ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में फिर से फेरबदल करने पर आमादा हो गयी, वह भी अध्यादेश के जरिये? इसका एक ही मकसद दिखता है, चुनिंदा बड़े औद्योगिक घरानों और देसी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाना!
केंद्र के लिए इन दिनों गुजरात नहीं, राजस्थान ‘सुधार और गवर्नेस’ का मॉडल बनता नजर आ रहा है. प्रधानमंत्री पद के भाजपा प्रत्याशी के तौर पर नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान गुजरात को विकास के सर्वोत्तम मॉडल के रूप में प्रचारित किया. लेकिन उनकी सरकार के लिए अब राजस्थान का ‘सुधार मॉडल’ अनुकरणीय बन गया है. केंद्र को जो कुछ करना होता है, वह पहले राजस्थान में होता है. फिर केंद्रीय स्तर पर उसे लागू किया जाता है. एक समय माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक रिश्ते कुछ असहज हैं, खासकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में राजस्थान के प्रतिनिधित्व को लेकर दोनों नेताओं में कुछ मतभेद की खबरें आयी थीं. लेकिन ऐसा लगता है कि ‘सुधार के निर्भीक एजेंडे’ के चलते दोनों नेताओं के रिश्तों में परस्पर सहमति का नया आयाम जुड़ा है. प्रधानमंत्री ने राजस्थान सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे कोलंबिया विवि के प्रोफेसर अरविंद पनगढ़िया को नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त करके एक बार फिर साबित किया कि केंद्र आर्थिक-प्रशासनिक सुधार के मामले में ‘राजस्थान शोज द वे’ की राह पर चल रहा है. इससे पहले, अक्तूबर में राजस्थान के मुख्य सचिव राजीव महर्षि को अरविंद मायाराम की जगह देश का वित्त सचिव बनाया गया था.
राजनीतिक-प्रशासनिक हलकों में माना जाता है कि पिछले वर्ष वसुंधरा सरकार ने महर्षि और पनगढ़िया की सलाह पर ही श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर कई विवादास्पद कदम उठाये. इन कथित सुधारों का पूरे देश के मानवाधिकार संगठनों, श्रमिक संघों और विपक्षी दलों ने विरोध किया. लेकिन बड़े औद्योगिक घरानों और विदेशी कंपनियों को वे कदम खुशगवार लगे. 1947 के इंड्रस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट में भी संशोधन किया गया. छोटे-मझोले उपक्रमों में श्रमिकों को नौकरी से निकालने के लिए सरकार की पूर्वानुमति की शर्त हटा दी गयी. राजे सरकार ने दलील दी कि इससे रोजगार बढ़ेगा और श्रमिकों में कौशल का विस्तार होगा. शिक्षा के क्षेत्र, खासकर प्राइमरी स्कूलों के मामले में उनके सुधार-एजेंडे को लेकर भी बावेला मचा. इसके अलावा भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार ने बेहद जनविरोधी कानूनी प्रावधान किया.
बीते दिसंबर में राजे सरकार ने भारतीय संविधान के बुनियादी उसूल- ‘मताधिकार में समानता’ पर हमला किया. पंचायत और अन्य स्थानीय चुनावों की अधिसूचना जारी होने से ऐन पहले इस विवादास्पद अध्यादेश के जरिये पंचायतों और जिला परिषदों के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए क्रमश: हाइस्कूल और मिडिल स्कूल पास होने को अनिवार्य बनाया गया है. सरकार के इस हैरतंगेज कदम को न्यायालय में भी चुनौती दी गयी है. अगर इस अध्यादेश को अमलीजामा पहना दिया गया तो राजस्थान की तीन-चौथाई ग्रामीण आबादी से कोई भी व्यक्ति पंचायत या जिला परिषद का चुनाव नहीं लड़ सकेगा. सबसे अधिक प्रभावित होंगे, दलित-आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग, जिनकी बड़ी आबादी को आज तक हमारी सरकारों ने हाइस्कूल स्तर तक भी शिक्षित नहीं किया. इसका दूसरा पहलू है कि राजस्थान की पंचायतों और जिला परिषदों के लिए अब ज्यादातर सवर्ण हिंदू ही चुनाव लड़ सकेंगे, क्योंकि हाइस्कूल तक शिक्षित लोगों की संख्या उनमें ज्यादा है.
विधानसभा के पिछले चुनाव में राज्य विधानसभा की 200 में 163 सीटों पर काबिज होनेवाली प्रचंड बहुमत की सरकार आखिर इस तरह के निरंकुश फैसले क्यों ले रही है? क्या भारतीय राजनीति के अभिजनीकरण के लिए यह किसी नये खतरनाक फॉमरूले की तलाश तो नहीं हो रही है? क्या आर्थिक सुधार के मामले में महर्षि-पनगढ़िया के सुझावों के अमलीकरण के बाद अब राजनीतिक सुधारों का भी कोई नया मॉडल खड़ा करने की कोशिश हो रही है?
कैसी विडंबना है, केंद्र सरकार ने भी हाल के दिनों में ताबड़तोड़ कानूनी संशोधनों, अध्यादेशों और अधिसूचनाओं के जरिये कुछ इसी तरह के हैरान करनेवाले कदम उठाये हैं. केंद्रीय स्तर पर भी श्रम कानूनों में खतरनाक संशोधन हुए, अब बीमा संशोधन अध्यादेश, कोयला आबंटन अध्यादेश और भूमि अधिग्रहण के किसान-विरोधी अध्यादेश आये हैं. भूमि अधिग्रहण के लिए किसानों के बड़े हिस्से की सहमति लेने और सोशल ऑडिट की अनिवार्यता के पूर्व प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है. यही नहीं, सरकार अब किसी निजी उपक्रम, एनजीओ या पीपीपी मॉडल आधारित उपक्रम के लिए भी किसानों की जमीन आसानी से झटक सकती है. किसानों की मांग और विशेषज्ञों की राय के बाद अभी पिछले साल के जनवरी में ही नया भूमि अधिग्रहण कानून लागू हुआ था. भाजपा के कई बड़े नेता उस संसदीय समिति के सदस्य थे, जिसने यूपीए शासन के दौरान पारित उक्त कानूनी संशोधन का प्रारूप तैयार किया. महज एक साल के अंदर ऐसी क्या जरूरत पड़ी कि मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में फिर से फेरबदल करने पर आमादा हो गयी, वह भी अध्यादेश के जरिये? इसका एक ही मकसद दिखता है, चुनिंदा बड़े औद्योगिक घरानों और देसी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाना!
आर्थिक स्तर पर बीमा कानून में संशोधन के लिए जिस अध्यादेश का सहारा लिया गया, वह भारतीय बीमा क्षेत्र के निजीकरण और विदेशीकरण की प्रक्रिया को और तेज करेगा. यह कदम सिर्फ निजी और विदेशी कंपनियों के फायदे और सहूलियत बढ़ानेवाला है. बीमाधारक को राहत या सहूलियत देने का एक भी नया प्रावधान नहीं जुड़ा है. अध्यादेश संसद के शीतकालीन सत्र के अवसान के ठीक बाद आया. आखिर इस पर संसद की मंजूरी क्यों नहीं ली गयी? प्रधानमंत्री, संसदीय कार्यमंत्री और भाजपा के तमाम बड़े नेता संसद में व्यवधान पर चिंता जाहिर करते हुए आये दिन ऐलान करते रहते हैं कि वे हर मुद्दे पर संसद में बहस करने को तैयार हैं. फिर बीमा क्षेत्र के और अधिक निजीकरण व विदेशीकरण का कानून संसद से क्यों नहीं पारित कराया गया? हाल के दिनों में अध्यादेशों व अधिसूचनाओं के जरिये सरकार की नीतियों और गवर्नेस मॉडल में उलटफेर के और भी कई बड़े फैसले लिये गये.
इस तरह का अध्यादेश-अधिसूचना आधारित गवर्नेस मॉडल खतरे का संकेत है. ‘अच्छे दिन आयेंगे’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे लोकप्रिय नारों के साथ बहुमत हासिल करनेवाली सरकार अगर बड़ी आबादी के हितों को नजरअंदाज कर अपने कार्यक्रमों और फैसलों का आधार सिर्फ कुछ खास लोगों के हितों को बनाती है, तो अंतत: लोकतंत्र का दायरा सिमटता है. दुनिया के कई देशों में ऐसे राजनीतिक प्रयोग अतीत में देखे जा चुके हैं, जिसके तहत बहुमत से चुनी सरकारों ने कुछ निहित स्वार्थो की सेवा में लोकतांत्रिक मूल्यों को तिलांजलि देकर संवैधानिक निरंकुशता का रास्ता अख्तियार किया. क्या भारत में भी उसी तरह की संवैधानिक निरंकुशता का खतरा मंडराने लगा है!
उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
urmilesh218@gmail.com

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