पिछले दिनों देश के प्रतिष्ठित अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में हिंदी के बारे में पढ़ा, जो कि साधारणत: अंगरेजी के अखबारों में कम ही दिखायी देता है या देखने को नहीं मिलता. कम से कम मैंने तो नहीं देखा. यहां तक कि हिंदी-अंगरेजी के वर्चस्व का विवाद ही देखा है. बहरहाल, इस अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर ‘हिंदी ऑन टॉप : मूव ओवर इंगलिश हिंदी इज दि न्यू पावर लिंगो’ शीर्षक से लेख देख कर मन उल्लसित हुआ.
यकीन मानें, इसे पढ़ कर मैं इतना हर्षित हुआ कि इसे फौरन फेसबुक पर शेयर करने का ख्याल मन में आया. फेसबुक और ई-मेल के जरिये मैने लेख को साधुवाद दिया और यह आशा जतायी कि हिंदी को आगे बढ़ानेवाले ऐसे अभियान ऐसे ही आगे बढ़ें. दरअसल, अंगरेजी अखबार के इस लेख में केंद्र की सत्तासीन वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा हिंदी की गतिविधियों को बढ़ावा देकर, हिंदी की आवश्कता पर प्रकाश डाल कर, हिंदी के महत्व को बताया गया है. साथ ही, आनेवाली पीढ़ी के लिए अब हिंदी पर जोर देने की आवश्यकता बतायी गयी है.
सदियों तक चली अंगरेजी की गुलामी के बाद एक अंगरेजी अखबार ने खुद हिंदी की तरफ घर वापसी की आवश्यकता बता कर एक नेक काम किया है. विशेष कर सागरिका घोष ने जिन्होंने यह लेख लिखने का नेक काम किया है. लेखिका ने मोदी सरकार के आगमन के साथ यह माना है कि देश में हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान का नारा बुलंद होगा. उन्होंने उदाहरण दिया है कि नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह और सुषमा स्वराज से लेकर स्मृति ईरानी तक सारे हिंदी-प्रेमी बन बैठे हैं. बहरहाल, इसी बहाने हिंदी फले-फूले, हमारी दुआ है. अगर सत्ता के शीर्ष पर हिंदी का इस्तेमाल होगा, तो उसका प्रचार-प्रसार जरूर होगा.
सत्य प्रकाश, कोलकाता
