।। कमलेश सिंह ।।
इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक
अगर परीक्षार्थी यह निर्णय करें कि परीक्षा में क्या पूछा जाये, तो परीक्षा तो पर-इच्छा रह ही नहीं गयी, स्वेच्छा हो गयी. दरोगा भर्ती में जैसे दौड़ाते हैं, वैसे ही दौड़ा दीजिये, जो फस्र्ट आये, आइपीएस. जो सेकेंड आवे, वह आइएएस.
लोक सेवा आयोग पर अभ्यर्थी भारी पड़े. सरकार सकपका गयी और अंगरेजी को किनारे कर दिया. छात्रों ने कहा दसवीं स्तर की अंगरेजी भी नहीं चाहिए. नरेंद्र मोदी ने जब पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली पर चढ़ाई की, तो सब ने यह माना कि जनता एक निर्णायक नेतृत्व चाहती थी और इसीलिए मोदी को ऐसा बहुमत मिला.
दस वर्षो से मनमोहन सिंह की हर बात पर झुकनेवाली सरकार से तंग देश का जनमत एक मजबूत नेता के पक्ष में गया. देश के हित में निर्णय लेने में जो पीछे ना हटे, दबाव में नहीं आये. ये मोदी नाम के व्यक्ति के लिए लहर नहीं थी, मोदी के नेतृत्व पर मुहर था. पर मोदी के सामने एक बड़ा संकट आया और उन्होंने भी आसान रास्ता चुना. भड़की भावनाओं को शांत करने के लिए लॉलीपॉप आगे कर दिया.
प्रदर्शन, नारेबाजी, फिर पत्थरबाजी. ये भावी आइएएस लोग कर रहे हैं, जिन पर कल कानून-व्यवस्था की जिम्मेवारी होगी. नयी-नयी सरकार को निगेटिव पब्लिसिटी गंवारा नहीं थी, इसलिए मान लिया. अंगरेजी मक्खी को सी-सैट के दूध से निकाल फेंका. यह सोच कर कि इसी बहाने हिंदीभाषी राज्यों में वाहवाही मिलेगी. प्रदर्शन बंद हो जायेंगे, पर हुआ नहीं. आंदोलन दूसरे चरण में चला गया.
प्रारंभिक परीक्षा यानी प्रीलिम्स में पास होने पर मुख्य परीक्षा यानी मेंस में बैठने को मिलता है. प्रारंभिक प्रदर्शन में पास हुए अभ्यर्थी अब प्रदर्शन के मुख्य चरण में प्रवेश कर चुके हैं. यह एडमिट कार्ड उन्हें नयी सरकार ने थमाया है. अब उनकी मांग है कि सिर्फ अंगरेजी नहीं, पूरे सी-सैट को ही रद्द किया जाये.
सी-सैट यानी सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट. यह समझ का परीक्षण है. यानी रामायण पढ़ लिये, तो यह बताइये कि सीता किसकी भाभी थी. यह जांचता है कि आप किताबी विषय तो रट आये हों, पर आप में आधारभूत योग्यता है या नहीं. बड़े बाबू बनने की इच्छा रखनेवाले विद्यार्थियों को यह खटकता है और वह भिड़ गये हैं इसे हटवाने में. जंतर-मंतर पर बैठ गये. सत्तालोलुप दलों ने इनको समर्थन भी दे दिया. सारे नेता अब उनके मंच से बोलते हैं कि इनके लिए सब कुछ आसान किया जाये. आइएएस बनना मुश्किल क्यों हो? नेता तो बन नहीं रहे ये लोग.
ये विद्यार्थी नहीं हैं. अगर विद्या की ललक होती, तो दसवीं की अंगरेजी सीख ही लेते ये एमए-बीए पास लोग. ये पदार्थी हैं. इनको अफसर बनना है. ये तो चाहेंगे कि परीक्षा ही नहीं हो. यह तो सरकार को निर्णय करना है कि परीक्षा लें या ना लें. इनको तो और मजा आयेगा अगर लॉटरी से फैसला हो. या पहले आवें पहले पावें का कोई सिस्टम बने.
आप को यह मजाक लग रहा होगा. पर सोचिये कि शुरू किसने किया? अगर परीक्षार्थी यह निर्णय करें कि परीक्षा में क्या पूछा जाये, तो परीक्षा तो पर-इच्छा रह ही नहीं गयी, स्वेच्छा हो गयी. दरोगा भर्ती में जैसे दौड़ाते हैं, वैसे ही दौड़ा दीजिये, जो फस्र्ट आये, आइपीएस. जो सेकेंड आवे, वह आइएएस.
किस्सा ही खतम. क्योंकि अंगरेजी को खत्म करने की नाजायज बात मनवाने के बाद वे और नाजायज करने पर उतारू हैं. एक आइएएस या आइपीएस के लिए अंगरेजी जानना जरूरी है. राष्ट्रीय स्तर की सेवा है. वह ऐसे राज्यों में नियुक्त हो सकते हैं, जहां लोग हिंदी नहीं जानते. उनकी दलील है कि हिंदीभाषी राज्यों के लोगों की अंगरेजी कमजोर होती है. अंगरेजी इस देश में किसी की मातृभाषा नहीं है.
गैर-हिंदीभाषी राज्यों के छात्र भी अंगरेजी सीखते हैं. दूसरी दलील है कि गांवों या छोटे शहरों के विद्यार्थियों को इतना नाकारा क्यों माना जाये कि वह साधारण स्तर की बोलचाल की अंगरेजी नहीं सीख सकते. मैं खुद हिंदीभाषी हूं. कॉलेज तक अंगरेजी बोलनेवालों की संगत नहीं रही, पर जरूरत हुई तो मैंने अंगरेजी सीख ली. यह एक भाषा है, कोई भूत नहीं कि पकड़ में ना आये. पर सरकार दबाव में आयी और वोट बैंक का मामला था, तो मान लिया. अब वे रीजनिंग हटवाने पर तुले हुए हैं.
क्लर्क की बहाली में रीजनिंग और अंगरेजी की परीक्षा होती है और आइएएस की बहाली में नहीं होगी, तो क्लर्क से ज्यादा बुद्धिमान आइएएस है, यह हम कैसे मान लेंगे. किसी को कल जिला सौंपना है, उसका इतना टेस्ट तो बनता है कि वह तर्क-कुतर्क को समझे . हिंदी से प्यार है पर थोड़ी अंगरेजी सीख लेंगे, तो क्या नुकसान है.
अब उनको हिंदी पर भी आपत्ति है. वे कह रहे हैं कि हिंदी को आसान किया जाये. भइया अंगरेजी भी नहीं, हिंदी भी नहीं और तमिलनाडु काडर मिल गया, तो मसाला-डोसा सब गुड़-गोबर. बचपन में हम रेडियो सुनते और स्टेशन नहीं बदला, तो शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम होता था. संगीत के प्रेमी होते हुए भी हमारे बड़े भाई को शास्त्रीय संगीत कभी नहीं सुहाया. कार्यक्रम शुरू होते ही वह छूट पड़ते और कहते कि छूट दो तो लोग शास्त्रीय संगीत सुनाने लगते हैं. लोक सेवा अभ्यर्थियों का यह शास्त्रीय संगीत अब मोदीजी को जरा नहीं सुहा रहा. पर छूट किसने दी?
