सफर के दौरान जो चीज जरूरी होती है, वह है खाना-पानी. कम दूरी की यात्रा में अधिकतर यात्री अपने साथ खाने-पीने की चीजें लेकर चलते हैं. लेकिन जब दूर की यात्रा हो, तो यात्रियों को प्लेटफार्म पर बिकनेवाले भोज्य पदार्थो एवं ट्रेनों में मिलनेवाले खाने पर निर्भर रहना पड़ता है.
राजधानी, दुरंतो एवं शताब्दी जैसी विशेष ट्रेनों में किराये के साथ सुविधाओं का दाम ले लिया जाता है, तो यह सोच कर यात्री तसल्ली करते हैं कि खाने-पीने का सामान ढोने के झंझट से छुटकारा है. लेकिन जब ऐसी सर्वसुविधासंपन्न ट्रेनों में खाने-पीने की चीजें नकली और खराब मिलें, तो गुस्सा आना स्वाभाविक है.
कभी खाने में तिलचट्टा मिलता है, तो कभी मिनरल वाटर के नाम पर प्लेटफार्म का पानी दे दिया जाता है. रेल किराया बढ़ने से लोगों को लगा कि यात्राी सुविधाएं बेहतर होंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
मनीष वर्मा, धनबाद
