दिनोंदिन बढ़ता प्रदूषण, बढ़ती आबादी से त्रस्त शहर, वनों को निगलती गगनचुंबी इमारतें, सूखा, विनाशकारी आंधी और चक्रवात. यह सब हमारी ही करतूतों का प्रतिफल है.जिस प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया, उसी को हम अपने क्षणिक लाभ के लिए नष्ट करने पर तुले हैं.
अगर हम यह सोचते हैं कि मनुष्य से ताकतवर कुछ भी नहीं, तो यह हमारी भूल भी है और बेवकूफी भी. इनसान विज्ञान के क्षेत्र में चाहे कोसों आगे निकल चुका हो, लेकिन जब बारी प्रकृति के तांडव की आती है तो उसका अंजाम सिर्फ मौत, मातम और तबाही होती है.
हमें अपनी अगली पीढ़ी को संरक्षित रखने के लिए पर्यावरण प्रदूषण से यथाशीघ्र निबटना होगा. अगर ऐसा न हुआ तो पूरी धरती का सत्यानाश तय है और यह खूबसूरत धरा जीवों का बसेरा न होकर जीवविहीन भूभाग में बदल जायेगी.
श्रीकांत ओझा, धनबाद
