।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
अर्थशास्त्री
भारत ने खाद्य सब्सिडी का स्थायी हल ढूंढ़ने का दबाव बनाया है. उसे इस रुख पर टिके रहना चाहिए. डब्ल्यूटीओ से औद्योगिक देशों को ज्यादा, विकासशील देशों को कम लाभ हुआ है. इसलिए संधि निरस्त हो जाये, तो घबराना नहीं चाहिए.
गत वर्ष विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की इंडोनेशिया में हुई बैठक में दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी थी. पहला मुद्दा गरीब को दिये जानेवाले सस्ते खाद्यान्न का था. भारत सरकार द्वारा किसान से महंगा खाद्यान्न खरीद कर गरीब को सस्ते दाम पर मुहैया कराया जा रहा है.
इस पर दी जा रही सब्सिडी डब्ल्यूटीओ के नियमों के अंतर्गत तय सब्सिडी की अधिकतम सीमा से अधिक है. पूरी संभावना थी कि ऑस्ट्रेलिया जैसे निर्यातक देशों द्वारा डब्ल्यूटीओ की अदालत में भारत के खिलाफ वाद दायर किया जाता. अत: डब्ल्यूटीओ के नियमों में बदलाव जरूरी है. इंडोनेशिया में सहमति बनी थी कि विकासशील देशों के द्वारा यह सब्सिडी अगले चार वर्षो तक दी जा सकेगी. इन चार वर्षो में समस्या का स्थायी समाधान खोज लिया जायेगा.
इस निर्णय में एक महत्वपूर्ण सिद्घांत छुपा हुआ था. मान्यता थी कि भोजन में भी खुले व्यापार को अपनाना चाहिए. जो देश गेहूं महंगा पैदा करते हैं, उन्हें अपनी जरूरत का उत्पादन स्वयं न कर, सस्ते आयात के जरिये अपने लोगों का पेट भरना चाहिए. पिछले दशकों में इससे कई विकासशील देशों को भारी परेशानी हुई है.
उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को सस्ते खाद्यान्न के आयात के लिए खोल दिया. इससे इनकी घरेलू उत्पादन व्यवस्था जजर्र हो गयी. फिर उन्हें महंगे खाद्यान्न भी खरीदना पड़ा, क्योंकि घरेलू उत्पादन व्यवस्था चौपट हो चुकी थी. खाद्यान्न के मूल्यों में वृद्घि के कारण कई देशों में आंदोलन हुए. अब डब्ल्यूटीओ का नया सिद्घांत है कि हर देश को अपने लोगों को सस्ता अनाज मुहैया कराने और ऊंचे मूल्यों पर खाद्यान्न खरीदने का भी अधिकार है.
इंडोनेशिया में दूसरी सहमति व्यापार के सरलीकरण पर हुई थी. वर्तमान में हर देश अपनी सुविधा के अनुसार आयातित माल की जांच के नियम बनाता है. जैसे एक देश गेहूं में आधा प्रतिशत मिट्टी हो तो उसे साफ मान सकता है, जबकि दूसरा देश उसी गेहूं को अस्वीकार कर सकता है.
माल के ‘इनवायस’ में कितनी डिटेल हो, इसके नियम हर देश द्वारा अलग-अलग बनाये जाते हैं. इससे निर्यातकों को परेशानी होती है. उन्हें माल भेजते समय विभिन्न देशों के नियमों के अनुसार अलग-अलग कागजात बनाने पड़ते हैं. बंदरगाह अथवा हवाइअड्डे से माल को बाजार तक पहुंचाने की सड़क आदि की समुचित व्यवस्था हर देश में नहीं थी.
इस मुद्दे पर इंडोनेशिया में सहमति बनी थी कि आयात एवं निर्यात के समान नियम बनाये जायेंगे और हर देश को सड़क एवं कंटेनर टर्मिनल जैसी न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी. अमीर देश इस समझौते पर दबाव दे रहे थे. उनका आकलन था कि व्यापार के सरलीकरण से उनकी कंपनियों के लिए निर्यात करना आसान हो जायेगा.
सही है कि इस समझौते से माल की ढुलाई का खर्च कम होगा और विश्व व्यापार में वृद्घि होगी. ढुलाई खर्च कम होने का हमारे निर्यातों पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. माल की क्वॉलिटी आदि के समान मानदंडों के लागू होने से हमारे निर्यातकों की राह भी आसान हो जायेगी.
बंदरगाह से बाजार तक पहुंचाने के लिए आयातित माल के लिए जो सड़क बनायी जायेगी, उसी सड़क पर निर्यात की ढुलाई करनेवाली ट्रक भी दौड़ेगी. हालांकि अमीर देशों की चाहत है कि व्यापार के सरलीकरण का समझौता तत्काल लागू कर दिया जाये. इंडोनेशिया में सहमति बनी थी कि इस समझौते को 31 जुलाई, 2014 तक लागू कर दिया जायेगा.
इस माह के अंत में इस उद्देश्य से डब्ल्यूटीओ की वार्ता संपन्न हो रही है. समस्या है कि व्यापार सरलीकरण के समझौते पर दस्तखत करने पर खाद्य सब्सिडी का मामला लटका रह जायेगा, चूंकि वर्तमान छूट केवल चार वर्षो के लिए है. चार वर्षो में स्थायी समझौता नहीं होने पर हम दोनों तरह से मारे जायेंगे. व्यापार सरलीकरण समझौते से हम बंध चुके होंगे और खाद्य सब्सिडी को मिली छूट चार वर्षो बाद समाप्त हो जायेगी.
दूसरी तरफ भी संकट है. यदि हम खाद्य सब्सिडी का स्थायी हल तत्काल मांगेंगे, तो औद्योगिक देश भी इंडोनेशिया के समझौते को तोड़ने को स्वतंत्र होंगे. ऐसी स्थिति में उन्हें व्यापार सरलीकरण के लाभ नहीं मिलेंगे, परंतु हमारे द्वारा दी जा रही खाद्य सब्सिडी डब्ल्यूटीओ कानून के अंर्तगत अवैध हो जायेगी और औद्योगिक देश प्रतिक्रिया के रूप में हमारे निर्यातों पर प्रतिबंध लगाने को स्वतंत्र होंगे. इस घटनाक्रम के शुरू होने पर डब्ल्यूटीओ की मूल संधि पर भी आंच आ सकती है.
फिलहाल भारत सरकार ने निर्णय लिया है कि व्यापार सरलीकरण समझौते पर तब तक दस्तखत नहीं किये जायेंगे, जब तक खाद्य सब्सिडी का स्थायी हल नहीं ढूंढ़ लिया जाता है. भारत सरकार को अपने इस मंतव्य पर टिके रहना चाहिए. डब्ल्यूटीओ से औद्योगिक देशों को लाभ ज्यादा और विकासशील देशों को लाभ कम हुआ है. इसलिए यह संधि निरस्त हो जाये, तो घबराना नहीं चाहिए.
