ब्रिक्स बैंक से विश्व बैंक को चुनौती

।। राजीव रंजन झा ।। संपादक, शेयर मंथन अभी यह मानना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स ने विश्व व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव ला दिया है. अभी केवल संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं. ब्रिक्स देशों के बीच आपसी आर्थिक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हितों की टकराहट को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पिछले दिनों संपन्न […]

।। राजीव रंजन झा ।।

संपादक, शेयर मंथन

अभी यह मानना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स ने विश्व व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव ला दिया है. अभी केवल संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं. ब्रिक्स देशों के बीच आपसी आर्थिक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हितों की टकराहट को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

पिछले दिनों संपन्न हुए, ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका, यानी ब्रिक्स सम्मेलन को भारत की राजनीति में इसलिए ज्यादा महत्व मिला कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर उनकी पहली विदेश यात्रा थी और इसमें वे एक साथ कई राष्ट्राध्यक्षों से मिले. लिहाजा इस यात्रा के दौरान कूटनीतिक सफलता-असफलता की कसौटी पर उन्हें कसने का प्रयास किया गया. लेकिन इस सम्मेलन की अंतरराष्ट्रीय अहमियत भारत की आंतरिक राजनीति में इसे मिली चर्चा से काफी ज्यादा है.

दरअसल, ब्रिक्स देशों का यूं इकट्ठा होना अमेरिका की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर हावी गुट को कतई नहीं सुहा रहा है. सम्मेलन से जुड़ी खबरों और विश्‍लेषणों में पश्चिमी देशों के मीडिया की भाषा में भी यह बात झलक जाती है. लंदन के फाइनेंशियल टाइम्स के एक लेख में इस सम्मेलन को ‘तथाकथित ब्रिक्स राष्ट्र’ कह कर संबोधित किया गया. अपने अस्तित्व में आने के इतने समय बाद भी यह समूह पश्चिमी मीडिया के लिए तथाकथित ही है! फाइनेंशियल टाइम्स का यह लेख ब्रिक्स को एक बिखरा समूह बताता है, जो केवल मौजूदा व्यवस्था से हताशा के कारण एकजुट हुआ है, न कि अपने मजबूत साझा हितों के कारण.

अब तक ब्रिक्स देशों का गुट अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अपनी जमीन तलाशने में ही लगा था, लेकिन इस महीने 14-16 जुलाई को हुए छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पहली बार इसने अपना एक ऐसा ढांचा खड़ा किया है, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए चुनौती की तरह है. इसने 100 अरब डॉलर का न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) बनाने का समझौता किया है. इसके अलावा ये पांच देश अतिरिक्त 100 डॉलर का एक आरक्षित मुद्रा भंडार या रिजर्व करंसी पूल तैयार कर रहे हैं.

ब्रिक्स के ये कदम सीधे तौर पर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के लिए चुनौती हैं. इस सम्मेलन के बाद जारी प्रेस वक्तव्य में इस समूह ने कहा भी कि ‘हम आइएमएफ के 2010 के सुधारों पर अमल नहीं होने को लेकर निराश और गंभीर रूप से चिंतित हैं, जिसके कारण आइएमएफ की वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है.’ इस जिक्र से स्पष्ट था कि वाशिंगटन स्थित संस्थाओं- विश्व बैंक और आइएमएफ के विकल्प के तौर पर ही ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक को खड़ा किया जा रहा है.

विश्व बैंक के विपरीत ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक में हिस्सेदार देशों की बराबर शक्ति होगी और इसमें अमेरिका की प्रभुता नहीं होगी. आइएमएफ का नेतृत्व हमेशा यूरोपीय देशों के हाथों में रहा है और विश्व बैंक का अध्यक्ष हमेशा अमेरिका ही चुनता रहा है. मगर ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक में हर देश को समान रूप से पांच-पांच वर्ष की अवधि मिलेगी, जिस दौरान इस बैंक की अध्यक्षता उसके पास रहेगी. बैंक का पहला अध्यक्ष बनाने का अधिकार भारत को मिला है.

आइएमएफ की मौजूदा व्यवस्था में ब्रिक्स देशों के पास केवल 10.3 प्रतिशत मताधिकार है. विश्व अर्थव्यवस्था में उनकी मौजूदा हैसियत की तुलना में यह काफी कम है. गौरतलब है कि क्रय क्षमता के आधार पर विश्व की जीडीपी में अमेरिका की हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत है, जबकि आइएमएफ में उसका मताधिकार 16.8 प्रतिशत है. इसकी तुलना में चीन की विश्व जीडीपी में हिस्सेदारी 16.1 प्रतिशत होने के बावजूद आइएमएफ में उसका मताधिकार केवल 3.8 प्रतिशत है. भारत विश्व जीडीपी में अपनी 6.0 प्रतिशत हिस्सेदारी के मुकाबले आइएमएफ में केवल 2.3 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है. सिर्फ भारत-चीन को साथ रख कर देखें, तो ये दोनों विश्व जीडीपी में 22.1 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने के बावजूद आइएमएफ में केवल 6.1 प्रतिशत मताधिकार रखते हैं.

फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक ब्रिक्स देशों को मौजूदा व्यवस्था में शामिल नहीं करने पर विश्व आर्थिक प्रशासन कई शक्ति-केंद्रों में बंट जायेगा, जो अपने प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे और विश्व की आर्थिक एवं वित्तीय स्थिरता के लिए साथ-साथ काम नहीं कर सकेंगे. दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रिक्स का उभरना उन्हें विश्व की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा नजर आ रहा है. पहली बार अमेरिका और पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था को एक गंभीर चुनौती मिल गयी है.

यह दिलचस्प है कि किसी समय एक बड़े अमेरिकी ब्रोकिंग फर्म की तरफ से निवेश के लिए उछाला गया शब्द ब्रिक्स अब अंतरराष्ट्रीय राजनय में एक महत्वपूर्ण जगह पा चुका है. गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने अपनी साल 2001 में एक रिपोर्ट में भविष्यवाणी की थी कि चार देशों – ब्राजील, रूस, भारत और चीन की विश्व अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी आगामी दशकों में लगातार बढ़ेगी और ये विश्व की कुछ सबसे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देंगे. इस रिपोर्ट के सामने आने के पांच साल बाद ही सितंबर, 2006 में इस रिपोर्ट में शामिल देशों के विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा के दौरान ही अलग से अपनी एक बैठक की, जो इस गुट का पहला औपचारिक कार्यक्रम कहा जा सकता है.

इसके बाद साल 2009 में पहला ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हुआ. साल 2010 में चार देशों के इस गुट में दक्षिण अफ्रीका को पांचवें देश के रूप में शामिल किया गया.

जिम ओ नील की रिपोर्ट में एक मुख्य बात कही गयी थी कि ब्रिक्स देशों की संभावनाओं के मद्देनजर जी7 देशों के समूह में इन्हें शामिल कर लेना चाहिए. इस समय ब्रिक्स के पांचों देश जी7 के विस्तारित रूप जी20 के सदस्य हैं. इसके बावजूद इन देशों को यह बात सालती रही है कि विश्व व्यवस्था में उन्हें पर्याप्त जगह व शक्ति नहीं मिली है. हालांकि अभी यह मानना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स ने विश्व व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव ला दिया है. अभी केवल संभावनाओं के दरवाजे खुले हैं. ब्रिक्स देशों के बीच आपसी आर्थिक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हितों की टकराहट को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

बेहतर होगा कि ब्रिक्स को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक में उलझाने के बदले केवल एक आर्थिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाये. अगर इसके सदस्य देश अपनी इस साझे दारी का इस्तेमाल विश्व मंच पर एकजुट होकर अपने प्रभाव को बढ़ाने में कर सके, तो उसके बेहतर परिणाम निकल सकेंगे. लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और अर्थनीति के बीच चोली-दामन का साथ रहा है और दोनों का आपस में उलझना स्वाभाविक है. इसलिए ब्रिक्स की गतिविधियों को उत्सुकता से देखना चाहिए, पर अभी से लंबी-चौड़ी उम्मीदें बांध लेना ठीक नहीं होगा.

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