अवधेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
राष्ट्रपति के अभिभाषण में तीन तलाक और हलाला की स्पष्ट चर्चा का मतलब ही था कि सरकार इसके खिलाफ फिर से विधेयक लाने की तैयारी कर चुकी है.
इसलिए विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 17वीं लोकसभा में जब अपने पहले विधेयक के रूप में ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019’ पेश किया, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. विपक्ष की ओर से इसके विरोध में फिर पुराने तर्क दिये गये. गौरतलब है कि सरकार के पिछले कार्यकाल में यह लोकसभा में पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में लंबित रह गया था. इस कारण इसे अध्यादेश के रूप में कायम रखा गया.
एआइएमआइएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का विरोध मुख्यतः पांच पहलुओं पर है. एक, तलाक सिविल मामला है. इसे अपराध बनाना गलत है. दो, अगर उच्चतम न्यायालय ने फैसला दे दिया कि एक साथ तीन तलाक से तलाक हो नहीं सकता, तो फिर कानून क्यों? तीन, पति को जेल में डाल देंगे तो महिला को गुजारा-भत्ता कौन देगा? चार, यह मौलिक अधिकारों की धारा 14 और 15 का उल्लंघन है.
पांच, यह हिंदू और मुसलमानों में भेद करता है. इस बार कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में पार्टी का मत रखा. थरूर ने कहा कि मैं तीन तलाक को खत्म करने का विरोध नहीं करता, लेकिन इस विधेयक का विरोध कर रहा हूं. तीन तलाक को आपराधिक बनाने का विरोध करता हूं. मुस्लिम समुदाय ही क्यों, किसी भी समुदाय की महिला को अगर पति छोड़ता है, तो उसे आपराधिक क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए? सिर्फ मुस्लिम पतियों को सजा देना समुदाय के आधार पर भेदभाव है.
तलाक अवश्य सिविल मामला है. इस्लाम में तीन तलाक के दो प्रकार मान्य हैं, तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन. एक साथ तीन तलाक यानी तलाक-ए-विदअत मान्य नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने 22 अगस्त, 2017 को 395 पृष्ठों के अपने ऐतिहासिक फैसले में इसके मजहबी, संवैधानिक, सामाजिक सारे पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए इसे गैर-मजहबी एवं असंवैधानिक करार दिया था. अगर यह इस्लाम में मान्य नहीं है, गैर-कानूनी भी है, तो फिर यह सिविल मामला नहीं हो सकता. कोई व्यक्ति गुस्से में एक महिला को क्षण भर में तलाक-तलाक-तलाक कह कर उसे पत्नी के अधिकारों से वंचित करता है, तो यह आपराधिक कृत्य है.
इसके खिलाफ अपराध कानून ही बनाया जा सकता है. हां, अगर इस्लाम में मान्य तरीके से तीन तलाक होता है, तो वह सिविल है और उसमें यह कानून लागू नहीं हो सकता. सभी समुदायों को शामिल करने का तर्क हास्यास्पद है. तलाक-ए-विदअत केवल इस्लाम में है, तो इसमें दूसरे समुदाय को कैसे शामिल किया जा सकता है. परित्यक्त पत्नियां थाने जाती हैं, लेकिन पुलिस के पास ऐसा कानून नहीं, जिसके तहत वह मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करे.
विपक्ष के विरोध एवं सुझावों के अनुरूप मूल विधेयक में कुछ बदलाव किये गये. वर्तमान विधेयक के अनुसार प्राथमिकी तभी स्वीकार्य की जायेगी, जब पत्नी या उसके नजदीकी खून वाले रिश्तेदार दर्ज करायेंगे. विपक्ष और कई संगठनों की चिंता थी कि प्राथमिकी का कोई दुरुपयोग कर सकता है.
दूसरी बात कि पति और पत्नी के बीच पहल होती है, तो मजिस्ट्रेट समझौता करा सकता है. तीसरी बात कि तत्काल तीन तलाक गैरजमानती अपराध बना रहेगा, लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गयी है कि मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकता है. विधेयक के अनुसार मुकदमे का फैसला होने तक बच्चे मां के संरक्षण में ही रहेंगे.
आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा. यह तर्क विचित्र है कि अगर पति को जेल हो गया, तो गुजारा भत्ता कौन देगा? मूल प्रश्न है कि किसी निर्दोष, निरपराध पत्नी के खिलाफ इस्लाम विरोधी अमानवीय कृत्य और अपराध करनेवाले व्यक्ति को सजा क्यों नहीं होनी चाहिए? कड़ी सजा होनी चाहिए. कड़ा कानून ऐसे सामाजिक-धार्मिक अपराधों में भय निरोधक की भूमिका निभाता है. अब प्रश्न है इस विधेयक के भविष्य का. लोकसभा में कोई समस्या है नहीं. राज्यसभा में इस समय 236 सदस्य हैं.
बहुमत के लिए 119 सदस्यों का समर्थन चाहिए. इस बार एक साथ तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को मूर्त रूप देनेवाले विधेयक के कानून में परिणत होने की संभावना पहले से ज्यादा प्रबल है. अगर ऐसा हुआ, तो यह कानून के द्वारा महिलाओं को न्याय दिलानेवाली एक सामाजिक क्रांति का आधार बन जायेगा.
