पेड़ लगाने की बातें क्यों नहीं होतीं?

मानसून इस बार शायद हमसे रूठा हुआ है. लोग परेशान और बेहाल हैं. सुनने में आ रहा है कि इस बार सौ साल में सबसे कम बारिश हुई. नयी सत्ता में आयी सरकार भी सूखे की आशंका से कम परेशान नहीं है. गौरतलब है कि इसी मुद्दे पर पिछली सरकार का बोरिया-बिस्तर बंधा था, क्योंकि […]

मानसून इस बार शायद हमसे रूठा हुआ है. लोग परेशान और बेहाल हैं. सुनने में आ रहा है कि इस बार सौ साल में सबसे कम बारिश हुई. नयी सत्ता में आयी सरकार भी सूखे की आशंका से कम परेशान नहीं है. गौरतलब है कि इसी मुद्दे पर पिछली सरकार का बोरिया-बिस्तर बंधा था, क्योंकि कम बारिश परोक्ष रूप से महंगाई के लिए जिम्मेदार है.

मगर हास्यपद बात यह है कि महंगाई, कम पैदावार, जमाखोरी कालाबाजारी पर तो रोज बातें हो रही हैं, पर बारिश कैसे आये, इसके लिए कोई उपाय नहीं कर रहा. जल प्रबंधन और नदियों व नहरों को जोड़ने की बातें खूब हो रही हैं, लेकिन पर्यावरण संतुलन का क्या? यह सच है कि कुछ पेड़ समय-समय पर लगाये जा रहे हैं, पर क्या यह काफी है? देश की लगभग आधी कृषि योग्य भूमि आज भी सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर है. पर क्या बिना पेड़ों के कभी पानी बरसेगा?

आशीष लोमगा, जमशेदपुर

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >