झारखंड की स्थानीय नीति तय करने के लिए बनी कमेटी ने अपनी अनुशंसा मुख्यमंत्री को सौंप दी है. कमेटी की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने अपने काम में लंबा समय नहीं लिया. लेकिन इस जल्दबाजी में कई सवाल अनुत्तरित रह गये हैं. रिपोर्ट देख कर लगता है कि उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ की तुलना में झारखंड की स्थानीय नीति अलग है. इसमें मूलवासी और झारखंडी के बीच फर्क किया गया है.
तृतीय और चतुर्थ वर्ग की नौकरी सिर्फ मूलवासियों के लिए होगी. मूलवासी के अलावा जो लोग बच गये हैं, वे या तो बाहरी हैं या झारखंडी. इन्हें तृतीय और चतुर्थ वर्ग की सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी. रिपोर्ट से साफ है कि झारखंडी का दर्जा पाना बहुत आसान है. इसके लिए जो शर्त तय की गयी है, वह कड़ी नहीं है. 15 साल से झारखंड में रहना, यहां जन्म लेना आदि. लेकिन वे सिर्फ नाम के झारखंडी होंगे. सिर्फ इतना ही लाभ होगा कि उन्हें अब बाहरी नहीं कहा जायेगा. पर असल सवाल है नौकरियों में लाभ का. यह तो उन्हें ही मिलेगा जिन्हें सरकार मूलवासी मानती है. इसमें अस्पष्टता है.
कमेटी ने अनुशंसा की है कि जिनकी तीन पीढ़ियां झारखंड में हैं, जो भूमिहीन हैं, वे मूलवासी माने जायेंगे. इसका निर्णय ग्रामसभा करेगी. क्या होगा उन लोगों का, जो शहरी क्षेत्र में तीन पीढ़ियों से रहते आये हैं. जमशेदपुर में टाटा स्टील में नौकरी करनेवाले ऐसे लोगों की संख्या अच्छी खासी है. तीन-तीन, चार-चार पीढ़ियों से ये टाटा में नौकरी कर रहे हैं, लेकिन जमीन खरीद नहीं पाये हैं. सरकार इन्हें मूलवासी मानती है या नहीं? ग्रामसभा को महत्वपूर्ण अधिकार दिये गये हैं. यहां गड़बड़ी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
जो भी हो, सरकार को इसके लिए बधाई दी जानी चाहिए कि काम आगे बढ़ा. हालांकि अभी इसे कानूनी दर्जा देने में कई अड़चनों से गुजरना होगा. हेमंत सरकार ने इतना तय कर दिया है कि अगले चुनाव में स्थानीय नीति बड़ा मुद्दा होगी. सरकार को इसका लाभ तभी होगा जब इसका लाभ लोगों को चुनाव के पहले मिले. नौकरियों में भरती बंद है. अगर हेमंत सोरेन सरकार इस स्थानीय नीति के बल पर बड़ी संख्या में बेरोजगारों को नौकरी देती है तभी उसका बड़ा राजनीतिक लाभ विधानसभा चुनाव में उसे मिलेगा.
