शांति, अहिंसा, सौहार्द का संदेश

डॉ सय्यद मुबीन जेहरा शिक्षाविद् किसी भी समाज को रहने लायक बनाने के लिए उस समाज में शांति और सौहार्द बनाये रखना जरूरी होता है. समाज में शांति बनाये रखने और मानवता की खातिर कई महान हस्तियों ने अपने जीवन तक का त्याग किया है. त्याग को जीवन उद्देश्य बनाकर ही हम समाज को सकारात्मकता […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | September 28, 2017 6:20 AM
डॉ सय्यद मुबीन जेहरा
शिक्षाविद्
किसी भी समाज को रहने लायक बनाने के लिए उस समाज में शांति और सौहार्द बनाये रखना जरूरी होता है. समाज में शांति बनाये रखने और मानवता की खातिर कई महान हस्तियों ने अपने जीवन तक का त्याग किया है. त्याग को जीवन उद्देश्य बनाकर ही हम समाज को सकारात्मकता प्रदान कर सकते हैं.
सत्य और अहिंसा की राह में खुद को बलिदान करनेवालों का जीवन-उद्देश्य त्याग के माध्यम से इंसानों के लिए ऐसा संदेश छोड़ जाने का होता है, जिस पर चलते हुए न केवल उनका जीवन सुखी हो, बल्कि उनका समाज भी शांति और सौहार्द की जिंदा मिसाल बन जाये. हालांकि, कई शांतिदूत हिंसा का शिकार हुए, किंतु उनका शांति और अहिंसा का संदेश आज भी जमाने को राह दिखा रहा है. इस ऐतबार से हमारे बीच आज महात्मा गांधी सबसे ज्यादा प्रासंगिक हैं.
जब हम अपने देश से दूर विदेश में होते हैं और हमें अपने देश का नाम शांति के दूतों की श्रेणी में नजर आता है, तो हमारा मन आत्मिक खुशी से भर जाता है. यही एहसास मुझे उस समय हुआ, जब मैं पिछले दिनों महीने भर के लिए अमेरिका की यात्रा पर थी. वहां न्यू यॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में गांधीजी को याद करते हुए किसी ने कहा कि आप गांधी के देश से हैं और गांधी का अहिंसा और सत्य का दर्शन उन्हें प्रेरित करता है.
यह सुन कर मेरा मन भारत की शांति, प्रेम और सौहार्द की भावना की नीति पर गर्व महसूस करने लगा. हालांकि, देश में भीड़ की हिंसा को लेकर वहां बातें हो रही थीं. लेकिन, जहां तक भारत की आत्मा की बात है, तो यह सच है कि उसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है.
शांति और अहिंसा इंसान की इंसानियत को परिभाषित करती है. लेकिन, अगर इंसानियत का इतिहास खंगाला जाये, तो इंसान से अधिक अमानवीय या हिंसक प्राणी और कहीं नजर नहीं आता. हिंसा इंसान को इंसानियत पर प्रहार करने पर मजबूर करती है.
विश्व में अलग-अलग समय में और अलग-अलग स्थानों पर कई शांतिदूत और शांति-अहिंसा के प्रचारक देखे गये हैं. भारत का इतिहास ऐसे महान शांतिदूतों की श्रेणी में कई नाम रेखांकित करता है. इसमें महात्मा गांधी का नाम सबसे ऊपर नजर आता है. गांधी ने अहिंसा की प्रेरणा इमाम हुसैन की कर्बला से ली थी.
इतिहास में निर्दोषों के नरसंहार के उदाहरणों में कर्बला की जंग एक ऐसी मिसाल है, जो रहती दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलती है. कर्बला जैसा जालिम समय आज तक नहीं हुआ और यहां जैसे मजलूम भी दुनिया ने आज तक नहीं देखे होंगे. मजलूम भी कौन? वह जो इस्लाम धर्म के पैगम्बर मुहम्मद साहब के परिवार वाले थे. और जालिम भी कौन? जो इस्लाम का नाम लेकर उनके परिवार का कत्ल कर रहे थे.
वह उनकी हत्या नहीं कर रहे थे, बल्कि आज के दौर में सत्य और असत्य की पहचान करवाने के लिए हमें मिसाल दे रहे थे कि जब कोई इस्लाम का नाम लेकर आतंकवादी गतिविधि करे, बेगुनाहों को मारे, असत्य की राह चले, तो कर्बला से पहचान लेना कि जालिम कैसे होते हैं और मजलूम कौन हैं. सत्य के लिए अपनी जान ही क्यों न कुर्बान करनी पड़े, तो फिक्र नहीं करनी चाहिए. कर्बला का यही संदेश है, जो हमें आतंकवाद के खिलाफ खड़े होने की राह दिखाता है.
आज से करीब चौदह सौ साल पहले पैगम्बर हजरत मोहम्मद के नवासे (नाती) इमाम हुसैन को कर्बला की तपती धरती पर केवल 72 बहादुर और सच्चे लोगों के साथ मानव अधिकारों की जंग लड़नी पड़ी थी.
सत्य के इन 72 बलिदानियों में उनका छह महीने का तीन दिन का प्यासा बेटा भी शामिल था. उनका 18 वर्ष का जवान बेटा अली अकबर भी इस जंग के शहीदों में था. उनके भाई हजरत इमाम हसन का यतीम बेटा हजरत कासिम भी था, जिनका कहना था कि उन्हें मौत शहद से अधिक मीठी लगती है. हजरत इमाम हुसैन की बहन हजरत जैनब के बेटे भी इस लड़ाई में शहीद हुए. कर्बला में भूखा-प्यासा शांतिदूतों को बेदर्दी से कत्ल ही नहीं किया गया, बल्कि उनकी और उनके साथियों की लाशों को बुरी तरह पामाल (विकृत) भी किया गया.
उनके परिवार के लोगों को सताया गया. उस समय के हाकिम यजीद के दरबार में उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने की कोशिश भी हुई, मगर हजरत अली की बेटी और इमाम हुसैन की बहन जैनब ने कर्बला के बाद इंसानियत के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाने का जो कारनामा अंजाम दिया, उससे आज भी असत्य के दरबार कांप जाते हैं.
हजरत इमाम हुसैन के बीमार बेटे हजरत जैनुल आबदीन को साथ लेकर जिस तरह जैनब ने जंग लड़ी हैं, वह आज के समाज में बेटियों की अहमियत को बुलंद करने के लिए काफी है. हजरत जैनब ने यजीद की सत्ता को जिस तरह हिला दिया, वह बताता है कि सत्य को कभी कत्ल नहीं किया जा सकता और मानवता का संदेश फैलानेवाले हमेशा जिंदा रहते हैं.
महात्मा गांधी से लेकर लियो टॉलस्टॉय और मार्क ट्वेन जैसे महान व्यक्तियों ने कर्बला की जंग को अपने लेख और अपनी जिंदगी में उतारा है. मुहर्रम, जो इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, वह अन्याय और हिंसा के खिलाफ एक निरंतर आंदोलन और प्रेरणा का प्रतीक रहा है. गौरतलब है कि इमाम हुसैन ने इस जंग से पहले हिंदुस्तान आने की चाह भी जहिर की थी.
अमेरिका से आने के बाद जब मैंने पिछले दिनों उसी स्थान से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को शांति के दुश्मनों को करारा जवाब देते देखा, तो मन में वहां से भाषण देने का जो सपना अपने लिए देखा था, वह उनके रूप में साकार होता नजर आया.
जब देश की विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र के पटल से विश्व को यह संदेश देती हैं कि भारत तो हमेशा से ही वसुधैव कुटुम्बकम का अनुयायी है, तब भारत की अंतरराष्ट्रीय नीति में इंसानियत नजर आती है. यह वही शांति की चाह है, जिसके लिए महात्मा गांधी ने अहिंसा का रास्ता चुना था और जिसकी राह उन्हें हजरत इमाम हुसैन की कर्बला में कुर्बानी ने दिखायी थी.
आज कर्बला के शहीदों को याद करते हुए हमें यह एहसास होता है कि पूरे विश्व को इस समय इस संदेश की सख्त जरूरत है, क्योंकि दुनिया में शांति की स्थापना के लिए हम सबको मिलकर ही काम करना होगा. आज आतंकवाद और आतंकियों की पहचान और उन्हें नाकाम बनाने के लिए हम सबको कर्बला के संदेश की बहुत जरूरत है.