अघोषित आपातकाल का दौर

‘आपातकाल’ हमारे लोकतंत्र के लिए काला धब्बा था. आलोचक भूमिगत होकर विरोध प्रकट किया करते थे. आज उससे भी खतरनाक माहौल देखने को मिल रहा है. अघोषित आपातकाल का. जो लोग मुखर होकर अलग विचार रखते हैं, उन्हें मौत के घाट उतारा जा रहा है. बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश को गोलियों से भून दिया […]

‘आपातकाल’ हमारे लोकतंत्र के लिए काला धब्बा था. आलोचक भूमिगत होकर विरोध प्रकट किया करते थे. आज उससे भी खतरनाक माहौल देखने को मिल रहा है. अघोषित आपातकाल का. जो लोग मुखर होकर अलग विचार रखते हैं, उन्हें मौत के घाट उतारा जा रहा है. बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश को गोलियों से भून दिया गया.

इससे पहले भी कलबुर्गी, ढाबोलकर एवं पंसारे जैसे लोगो को मार दिया गया था. सबसे दुख की बात है कि सोशल मीडिया में कुछ खास लोग इन मौतों पर जश्न मना रहे हैं. यह हमारी संस्कृति नहीं है. दुश्मन की भी मौत होने पर भी हम शोक जाहिर करते हैं.

अब तो ऐसा लगता है, हम फासीवाद की ओर बढ़ रहे हैं. स्टालिन, मुसोलिनी व हिटलर के शुरुआती माहौल कुछ इसी तरह के थे, जैसा आज हिंदुस्तान का है.

जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

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