कूटनीति के पेच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सकारात्मक बातचीत के अगले ही दिन थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने कह दिया कि चीन से सावधान रहने की जरूरत है और दोनों देशों के बीच तनातनी कभी भी युद्ध का रूप ले सकती है. सीमा पर जोर-जबर के अलावा दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया […]

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सकारात्मक बातचीत के अगले ही दिन थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने कह दिया कि चीन से सावधान रहने की जरूरत है और दोनों देशों के बीच तनातनी कभी भी युद्ध का रूप ले सकती है. सीमा पर जोर-जबर के अलावा दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत के रणनीतिक तथा आर्थिक हितों को कमजोर करने की चीनी कोशिशें भी चिंताजनक हैं. पाकिस्तान में चीन द्वारा बनाया जा रहा आर्थिक गलियारा तो सीधे हमारी संप्रभुता पर चोट है.

जानकारों की मानें, तो डोकलाम में चीन के नरम पड़ने के पीछे ब्रिक्स सम्मेलन को सफलतापूर्वक कराने की मंशा भी हो सकती है. हालांकि ब्रिक्स घोषणा में पहली बार पाकिस्तान-समर्थित आतंकी गिरोहों का उल्लेख हुआ है, पर मसूद अजहर पर पाबंदी के मामले में चीन के रुख में बदलाव नहीं आया है. पाकिस्तान बदस्तूर भारत को अस्थिर करने के काम में लगा हुआ है.

इस पृष्ठभूमि में अपने आक्रामक पड़ोसियों से सावधान तथा तैयार रहने को लेकर सेनाध्यक्ष का बयान तार्किक है. निश्चित रूप से युद्ध से स्थायी शांति हासिल नहीं हो सकती है और इसके लिए बातचीत तथा कूटनीति का रास्ता ही बेहतर है, लेकिन सुरक्षा को चाक-चौबंद करने तथा सैन्य तैयारियों को मजबूत करने में भी कोई कसर नहीं रहनी चाहिए. डोकलाम में भारत ने दोनों ही मोर्चे पर अपने सुलझे हुए, पर ठोस रवैये का प्रदर्शन किया है. ब्रिक्स सम्मेलन का सफल आयोजन चीन के लिए प्रतिष्ठा का मसला तो था ही, यह भारत समेत अन्य सदस्य देशों के लिए भी बेहद अहम था, जो तेज गति से बदलती वैश्विक परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं. भारत और चीन के आपसी संबंधों को भी इससे सही दिशा मिलने की उम्मीद है.

चीन जल्दबाजी में फैसले नहीं लेता है तथा उसके मंसूबे धीरे-धीरे जाहिर होते हैं. सो, अभी यह कह पाना मुश्किल है कि डोकलाम की तरह वह आगे भी अपनी ताकत का बेजा प्रदर्शन करेगा या नहीं? इसके लिए हमें कुछ इंतजार करना होगा. चीन के सामने आर्थिक दर घटने और बड़े घरेलू कर्ज के भार जैसी चुनौतियां हैं. ऐसे में वह भारत के साथ बढ़ते कारोबार का नुकसान नहीं करना चाहेगा. जैसा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज कह चुकी हैं कि भारत के आर्थिक विकास में चीन के सहयोग की बड़ी भूमिका है. इसलिए परस्पर सहयोग के जरिये ही दोनों देश आगे बढ़ सकते हैं तथा वैश्विक परिदृश्य में महती भूमिका निभा सकते हैं. इसके लिए दोनों पक्षों को कूटनीति के सहारे विवादों को संवाद से सुलझाना होगा.

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