यह कहा जा रहा है कि अब आधार का डुप्लीकेशन नहीं हो सकता. एक व्यक्ति दो आधार कार्ड नहीं बनवा सकता. अगर यह सच है, तो अब सही, गरीब व जरूरतमंद को सीधे इसके माध्यम से उसके खाते में लाभ मिलेगा. टेक्नोलॉजी के कारण अब यह संभव लग रहा है कि यह लूट नियंत्रित हो सकती है, तो इस पर इतनी हायतौबा क्यों?
मिडडे मील जैसी असरदार व बेहतर योजना की बात करें. जाइए किसी गांव में. स्कूल में पढ़ने आते हैं, सौ बच्चे और राशन उठ रहा हैं 150 बच्चों का. इसी तरह स्कॉलरशिप का मामला है. स्कूल में बच्चों की उपस्थिति कुछ और होती है, पर ड्रेस बंटने, साइकिल बंटने, स्कॉलरशिप पाने एवं सरकारी सुविधा पाने वाले छात्रों की संख्या कुछ और दिखायी जाती है.
इसी तरह किसान बीमा का प्रसंग है, पेंशन का प्रसंग है. राशन वितरण का मामला है, जहां हाथ डालिए स्तब्ध करनेवाले भ्रष्टाचार पाएंगे. सबसे आश्चर्य की बात है कि अब ये चीजें किसी को उद्वेलित या बेचैन नहीं करती. पहले ऐसे प्रसंगों पर बड़े जनांदोलन होते थे. पंचायती राज या जिला परिषद् की व्यवस्था में भी यही कार्यसंस्कृति प्रवेश कर गयी है. मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन के किस्से पढ़िए. बड़ा बजट है, तो वहां छोटी-छोटी चीजों पर दो सौ-चार सौ करोड़ की लूट है. बेचारे राजीव गांधी पैंसठ करोड़ के बोफोर्स प्रकरण के नाम पर सत्ता से गये. आज तो गली-गली पचास-साठ-सौ करोड़ के घोटाले हो रहे हैं. अप्रैल महीने की खबर है, राजस्थान के जयपुर में बड़ा सिंचाई घोटाला सामने आया है. महज सरकारी सब्सिडी हड़पने के लिए किसानों के नाम फर्जी खाते खुलवाये गये.
किसानों के खेतों में ड्रिप्स सिंचाई के लिए कोई यंत्र नहीं लगा और भारी राशि गायब हो गयी. जिन किसानों के नाम पर यह सब हुआ, उन्हें पता तक नहींं. अब सिंडिकेट बैंक में हुए घोटाले की सीबीआइ जांच हो रही है. इसी तरह 9 अप्रैल 2017 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की लीड खबर थी कि ग्रामीण रोजगार योजनाओं में तीन करोड़ जाली नाम पाये गये.
यह भी पाया गया कि इन कामों में कुल दर्ज मजदूर 25.31 करोड़ हैं, पर सक्रिय मजदूर महज 10.18 करोड़ हैं. मनरेगा में कुल 12.49 करोड़ जॉब कार्ड जारी किये गये हैं, पर सक्रिय जॉब कार्ड वाले मजदूर महज 6.59 करोड़ हैं. आशंका है कि सक्रिय काम करने वाले परिवारों में से चौदह फीसदी संदिग्ध हैं. यह भी सूचना है कि सबसे अधिक जाली जॉब कार्ड मध्यप्रदेश में जारी किये गये. फिर उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम, राजस्थान, छत्तीसगढ़, ओड़िशा एवं आंध्र प्रदेश में. हर कल्याणकारी योजना की तह में आप जाएं, तो भारी लूट मिलेगी. एक तरफ हम इस लूट से परेशान होते हैं. इसे ठीक करने की बात करते हैं, पर जब कोई ठोस कदम उठता है, तो हम उसके खिलाफ आवाज उठाने लगते हैं. अंतत: सुधार की प्रक्रिया कैसे और कहां से संभव है? भ्रष्टाचार विरोधी जमात भ्रष्टाचार पर अंकुश भी चाहती है, पर इसके लिए कोई ठोस ब्लूप्रिंट भी नहीं बताती? कोई अन्य विकल्प सामने आता है, तो उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं. ऐसा ही हो रहा है आधार के साथ.
कम्युनिकेशन और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हुई क्रांति ने दुनिया को एक नये दौर में पहुंचा दिया. यह ‘डेथ ऑफ डिस्टेंस’ का युग है, ‘ग्लोबल विलेज’ और सूचना क्रांति का युग है. जिन समस्याओं से हम या सिस्टम परेशान और बैचेन थे, उनसे मुक्ति की एक नयी झलक मिली है. इसी दौर में दुनिया के मशहूर पत्रकार और न्यूयार्क टाइम्स के बड़े नाम थॉमस एल फ्रीडमैन की महत्वपूर्ण पुस्तक सामने आयी ‘ द वर्ल्ड इज फ्लैट ’. इस पुस्तक में सूचना क्रांति के नायक के रूप में भारत से जो नाम दुनिया में गूंजा, उनमें इंफोसिस के नंदन नीलेकणि थे. उनकी किताब ‘इमेजिंग इंडिया: आइडियाज फार ए न्यू कंट्री’ काफी प्रसिद्ध हुई. खासतौर से एक नये भारत की कल्पना को लेकर.
नंदन नीलेकणि के लेखन में आप पाएंगे कि उनमें सत्तर-अस्सी के दशकों के बीच बड़े हो रहे, उन भारतीय युवाओं की पीड़ा और बैचेनी है, जो एक नया भारत देखना चाहते थे. भले वे राजनीति में रहे हों या नहीं, अपने लेखन और काम (टेक्नोलॉजी) से नया भारत बनाना चाहते थे. मेरा निजी परिचय नीलेकणि से नहीं है, पर उनकी पुस्तकों और लेखन में उन करोड़ों मेरे जैसे बेजुबान भारतीयों की प्रबल भावनाओं का प्रतिबिंब है, जो एक बेहतर, सशक्त और सुंदर भारत चाहते हैं.
चूंकि दुनिया स्तर पर टेक्नॉलॉजी के वह विशेषज्ञ हैं, इस कारण उन्होंने अपनी क्षमता, बुि़द्ध कौशल और समझ को इस काम में लगाया कि कैसे टेक्नोलॉजी, गर्वनेंस, विकास और देश बदलने में कारगर हो सकती है.
इसी तरह आरएस शर्मा हैं, उनको जाना बहुत बाद में. कोलकाता के ‘रविवार’ पत्रिका में काम करते हुए उनके बारे में सुना. पूर्णिया में वह जिलाधिकारी थे. जमीन रिकॉर्ड को लेकर शायद देश के सबसे विवादास्पद इलाकों में से एक. वहां पहली बार उन्होंने कंपूटराइज्ड लैंड रिकॉर्ड तैयार करवाया.राजीव गांधी तब प्रधानमंत्री बने ही थे, उनमें भारत बदलने की भूख थी. वह पूर्णिया आये. इस काम का श्रेय भी लिया. श्री शर्मा का हौसला बढ़ाया. व्यवस्था या गर्वनेंस में टेक्नालॉजी का यह नया प्रयोग था. बेगूसराय, जो बिहार का लेनिनग्राद माना जाता था, वामपंथी ताकतों-विचारों प्रभाव का इलाका.
लगभग बीस वर्षो पहले श्री शर्मा यहां कलक्टर रहे थे, हाल में मेरा वहां एक गांव में जाना हुआ. सामान्य लोगों से उनके काम, निष्पक्षता और इंटीग्रिटी के बारे में सुना. इतने वर्षों बाद भी वह जनमानस में थे. बाद में वह बिहार में ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हुए. अनेक प्रभावी कदम उठाये. पर उनके काम को नजदीक से जाना झारखंड में प्रभात खबर का संपादन करते हुए. विलक्षण प्रतिभा, प्रतिबद्ध और लोक सरोकार के आदमी. हमेशा कुछ नया और सकारात्मक करने के भाव से प्रेरित.
झारखंड में उन्होंने फाइल ट्रैकिंग सिस्टम शुरू की. बायोमेट्रिक सिस्टम शुरू करवाया. अमूमन अधिकतर सरकारी कर्मचारी, अध्यापक जो सरकारी कोष से वेतन लेना धर्म समझते हैं, पर समय से दफ्तर आना, कार्यालय में रहना अपना फर्ज नहीं मानते, वे सब उनके विरोधी बन गये थे.
जो सरकारी अफसर, दफ्तर को धर्मशाला समझते थे, उनकी बेचैनी सबसे अधिक थी. झारखंड में लूट की जो वेगवान नदी बह रही थी, उसमें श्री शर्मा जैसे अफसर बड़े अवरोध थे. सात साल में झारखंड में नौ बार ट्रांसफर पाने वाले श्री शर्मा आइआइटी कानपुर से पढ़े हैं. वर्ष 2000 में 45 वर्ष की उम्र में वह अमरीका के कैलिफोर्निया विश्ववद्यिालय गये.
कंप्यूटर्स साइंस में मास्टर करने. अमेरिका में अध्ययन किया, पर उनकी मूल ताकत ठेठ गंवई है. आज भी गांव से जुड़े हैं, इसलिए भारत की मिट्टी की असल चुनौतियों-समस्याओं को जानते हैं. संयोग से जब आधार का काम शुरू हुआ, तो नंदन नीलेकणि ने पूरे भारत से वैसे प्रतिभाशाली अफसर की तलाश शुरू की, जो इस काम को मुकाम तक पहुंचा सके. नंदन नीलेकणि प्राइवेट सेक्टर से सरकार में आये थे, जो टैलेंट हंट (प्रतिभा की तलाश) में यकीन करते हैं. पूरे देश की आइएएस ऑफिसर्स की सूची के बीच से, लंबी प्रक्रिया के बाद आरएस शर्मा का चयन आधार के लिए हुआ. इस तरह देश में आधार के काम की नींव पड़ी.
नंदन नीलेकणि और आरएस शर्मा की टीम का मैंने इसलिए उल्लेख किया कि आधार को मूर्तरूप देने वाले इन दोनों की प्रतिभा, साख, पृष्ठभूमि और कामकाज लोग समझ सकें. ये राजनीतिक नारेबाजी, झूठे वायदे और प्रपंच के संसार से दूर थे. अपनी प्रतिभा, अपनी ईमानदारी, अपनी निष्ठा और इनोवेटिव टैलेंट की बदौलत अपनी जगह बनायी. इनके काम की बुनियाद में देश, समाज के प्रति सही प्रतिबद्धता रही है. इसलिए आज आधार दुनिया में सबसे बड़ा डिजिटल आइडेंटिटी प्रोग्राम बन चुका है. दुनिया में भारतीय टेक्नोलॉजी की नयी देन के रूप में यह एक अलग पहचान बना चुका है. यह हर भारतीय के लिए गौरव का विषय है. केपीएमजी से जुड़े जगजीत भट्टाचार्या ने कहा है कि बायोमेट्रिक को पहचान बनाने के संदर्भ में भारत, दुनिया के अन्य देशों से कम से कम एक दशक आगे निकल गया है.
आधार को 2009 में यूपीए सरकार ने शुरू किया. हालांकि भाजपा का दावा है कि 2003 में एनडीए सरकार ने इसकी नींव डाली. वर्ष 2016 में निर्णायक आधार एक्ट बना, जिसने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड इस्तेमाल कहां और कैसे होगा? सरकारी योजनाओं से पूरी ताकत से आधार को हथियार बना कर भ्रष्टाचार खत्म करने का श्रेय तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही है. गुजरे 70 वर्षों में भ्रष्टाचार खत्म करने का सबसे गंभीर प्रयास और साहसिक कदम इस केंद्र सरकार ने उठाया है. अब तक 113 करोड़ आधार कार्ड बन चुके हैं. लगभग 99 फीसदी से अधिक वयस्क लोगों के पास आधार है. इन दिनों स्कूली बच्चों और आंगनबाड़ी सेविकाओं के आधार बनने की प्रक्रिया तेज है. जन वितरण प्रणाली, पहल, मनरेगा, पेशन, छात्रवृति जैसे कल्याणकारी कामों में इसका सबसे प्रभावी योगदान है.
अगर सरकार की बात मानें, तो पिछले दो-ढाई वर्षों के दौरान इन योजनाओं के बीच से बिचौलियों व फर्जी लोगों के खतम होने से उनचास हजार करोड़ रुपये की बचत हुई है. किन कार्यक्रमों से? मनरेगा, पहल, जनवितरण प्रणाली और स्कूलों की योजनाओं में बिचौलियों की दलाली या लूट रोकने से पिछले साल विश्व बैंक ने डिजिटल डिविडेंड रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट में यह अनुमान है कि भारत सरकार की सभी योजनाओं में अगर आधार का इस्तेमाल होगा, तो हर साल 11 बिलियन डॉलर (702 अरब रुपये लगभग)की बचत होगी. विश्व बैंक के प्रधान अर्थशास्त्री पॉल रोमर ने माना है कि अगर दुनिया में इसका प्रचलन हो जाये, तो यह संसार के लिए वरदान है.
आधार के कारण पांच करोड़ से अधिक बैंक खाते खुले हैं. आज तैंतालीस करोड़ से अधिक निजी बैंक खाते आधार से जुड़ गये हैं. सरकारी लाभ या राहत या सब्सिडी, सीधे जरूरतमंदों और सही लोगों के इन खातों में जाये, यह आधार ने संभव बनाया है. एनसी सक्सेना या राजीव गांधी की पीड़ा का हल इसमें दिखाई देता है. सब जानते हैं कि कैसे सब्सिडी हड़पने या गरीबों के नाम पर सरकारी योजनाओं की लूट के लिए फर्जी नाम, फर्जी खाते, चलते रहे हैं. कैसे ताकतवर, भ्रष्ट, बिचौलिये, व्यवस्था और कानून के साये या संरक्षण में खुलेआम ये सब करते रहे हैं.
इसमें राजनीतिक प्रश्रय कितना था, व्यवस्था और कानूनी प्रक्रिया की अक्षमता और लाचारी कितनी थी, यह अलग शोध, जांच या अध्ययन का विषय है. पर पिछले तीस-चालीस वर्षो से सरकारी खजाने से गरीबों के नाम पर जो लूट चल रही थी, वह शहरों में बैठे लोग नहीं जानते.
सैद्धांतिक बहस, दर्शन और बौद्धिक प्रखरता की दुनिया में सिमटे लोग नहीं जानते कि किस तरह हर क्षेत्र में डुप्लीकेट और फर्जी कार्ड बनते थे. एक-एक आदमी के पास दो से पांच ड्राइविंग लाइसेंस होते थे. अनेक राशन कार्ड होते थे.
इंसान गुजर गया, वृद्धावस्था पेंशन बरसों से चल रही है. व्यक्ति है ही नहीं और मनीआर्डर से वृद्धावस्था पेंशन आ रही है. दादा भाई नौरोजी ने अंग्रेजों की लूट कथा को ‘ड्रेन थ्योरी’ के रूप में लिखा. सखाराम देउस्कर ने ‘देशेर कथा’ लिखी. लाला जगतराम सेठ ने कैसे मुगल शासकों को धोखा देकर अंगरेजों के हाथ भारत को बेच दिया. उस तर्ज पर इन गरीबों के लिए इन कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर आजाद भारत में हुई या हो रही इस लूट कथा को कोई लिख ही नहीं सका.
यह कहा जा रहा है कि अब आधार का डुप्लीकेशन नहीं हो सकता. एक व्यक्ति दो आधार कार्ड नहीं बनवा सकता. अगर यह सच है, तो अब सही, गरीब व जरूरतमंद को सीधे इसके माध्यम से उसके खाते में लाभ मिलेगा. टेक्नोलॉजी के कारण अब यह संभव लग रहा है कि यह लूट नियंत्रित हो सकती है, तो इस पर इतनी हायतौबा क्यों? 125 करोड़ों की आबादी में 113 करोड़ लोगों का आधार बन चुका है. 61.97 करोड़ एलपीजी गैसधारी, 71.51 करोड़ राशनकार्डधारी, लोग इससे जुड़े हैं.
इन चीजों में आधार के प्रयोग से, गवर्नेंस में सुधार हुआ. वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने बजट भाषण में उल्लेख किया था कि 125 करोड़ की आबादी में सिर्फ 1.27 लाख लोग ही अपनी आयकर रिटर्न में 50 लाख से अधिक आय दिखाते हैं. महज 25 लाख लोग, अपनी आय 10 लाख से अधिक दिखाते हैं. अब आप गौर कीजिए! शादी हो, घर निर्माण हो, वैभव प्रदर्शन की बात हो तो हर गली-मोहल्ले में अनेक करोड़पतियों की गूंज होती है, पर आयकर देने में वे अपनी हैसियत छुपा लेते हैं. यह मुल्क कैसे चलेगा? 1.08 करोड़ आधार रखनेवाले लोग अपने पैनकार्ड से भी जुड़े हैं. 25 करोड़ पैनकार्ड धारी हैं.
113 करोड़ आधार कार्डधारी हैं लेकिन छह करोड़ से कम लोग आयकर रिटर्न भरते हैं. यह भी सूचना है कि कई लोग एक से अधिक पैनकार्ड भी रखते हैं. 800 पैनकार्ड रखनेवाले भी मिले हैं. अब पैनकार्ड को आधार से जोड़ देने की स्थिति में यह फर्जीवाड़ा भी बंद हो सकता है.
चार्टर्ड एकाउंटेंट दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने सीए विशेषज्ञों को संबोधित करते हुए कहा, स्विस बैंक ने कहा है कि पिछले साल भारतीयों द्वारा पैसा जमा करने में 45 फीसदी की कमी आयी है. सरकार ने एक लाख कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है. 37 हजार फर्जी कंपनियों पर सख्त कार्रवाई की सूचना है. पिछले 11 साल में सिर्फ 25 सीए के खिलाफ कार्रवाई हुई है, जबकि 14 सौ से अधिक सीए विशेषज्ञों के खिलाफ सालों से मामले लंबित हैं. क्या देश में सिर्फ 32 लाख लोग ही हैं, जिनकी सालाना आय 10 लाख रुपये से अधिक है?
मौजूदा समय में देश में 2.7 लाख सीए हैं और इनमें से ही कुछ ने फर्जी कंपनी वालों की मदद की होगी. देश में तीन लाख कंपनियों के लेनदेन जांच के दायरे में हैं. यह स्पष्ट है कि पैसेवाले इस ताकतवर वर्ग के खिलाफ पहली बार ठोस कार्रवाई हो रही है और कोई सरकार साहस के साथ इन मूल सवालों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बना रही है.
इस तरह यह बड़ी संभावना बनती है कि हम भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की दिशा में एक बड़ी छलांग लगा सकें. फिर पैनकार्ड को आधार से जोड़ने पर यह इतनी हायतौबा सड़क से उच्चतम न्यायालय तक क्यों? क्या हम चाहते हैं कि कई पैनकार्ड, एक व्यक्ति रखे या एक व्यक्ति की संपत्ति का पूरा ब्यौरा एक जगह न मिले?
यह सूचना है कि 63 मंत्रालयों के 530 सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों और पुन: 75 मंत्रालयों की 1200 ऐसी योजनाओं को आधार से जोड़ा जायेगा. सरकार की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी), मिशन वेबसाइट पर भी यह उल्लिखित है. उल्लेखनीय है कि डीबीटी 2013 में शुरू की गयी.
यह केंद्र सरकार का एक प्लेटफार्म है, इसके माध्यम से सब्सिडी या लाभ, सीधे भारत सरकार के कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया से लाभ पाने वाले के खाते में जाएगा. डीबीटी ने इस तरह की लगभग 500 कल्याणकारी योजनाओं की व्यापक पहचान शुरू कर दी है. यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथारिटी आफ इंडिया के सहयोग से आधार अधिनियम की धारा (7) के तहत. पिछले साल कैबिनेट सचिवालय के नवंबर सर्कुलर में यह सूचना थी. फरवरी 2017 तक लगभग 33.5 करोड़ लोगों को डीबीटी के तहत सीधे लाभ मिला था.
लगभग 16.8 करोड़ या 50 फीसदी लोग अपने हक के कल्याणकारी काम का पैसा या सब्सिडी सीधे आधारयुक्त बैंक खातों के माध्यम से पा चुके थे. लगभग 30 फीसदी लोग जिनके पास आधार से जुड़े बैंक खाते थे, वे इन लाभकारी योजनाओं में लाभ पाने के हकदार थे, लाभ नहीं पा सके. यह है आधार की उपयोगिता, इस तरह टेक्नोलॉजी से भ्रष्टाचार नियंत्रित करने और भारत का भविष्य गढ़ने की दिशा में आधार का प्रयोग एक भारी बदलाव लानेवाला कदम या मूक क्रांति है.
यह सच है कि हम राजनीतिज्ञ, मीडियाकर्मी, विचारक, पंडित निजता के द्वंद्व पर बहस कर रहे हैं. पर, इस योजना ने आमजन के मानस पर असर डाला है. हाल में पैनकार्ड (आयकर पहचानपत्र) को आधार से जोड़ने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गंभीर बहस चली. इसका विरोध करने वाले पक्ष से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ने पूछा कि पैन को आधार से जोड़ने में क्या दिक्कत है? सरकार कहती है कि इस कदम से टैक्स चोर पकड़ में आयेंगे. विरोध के वकील के पास इसका विश्वसनीय जवाब नहीं था. प्राइवेसी के सिद्धांत और आदर्श महत्वपूर्ण हैं.
पर देश में बड़ी तादाद में बड़ी संख्या में लोगों ने कई-कई पैनकार्ड रखे हैं. एक आदमी को क्यों अनेक पैनकार्ड चाहिए? कानूनी प्रावधान है, एक व्यक्ति एक पैनकार्ड. भारत सरकार के राजस्व सचिव ने हाल में बताया कि देश में कुल छह लाख कंपनियां आयकर रिटर्न दाखिल करती हैं. नौ लाख कंपनियां आयकर रिटर्न ही नहीं भरती, जबकि उनका रजिस्ट्रेशन है. हमने प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से यह सुना है कि 133 करोड़ के इस देश में सिर्फ 32 लाख लोगों की सालाना आमद ही 10 लाख से अधिक है.
यह आयकर दाखिल करनेवालों के आंकड़ों से स्पष्ट है. जबकि पिछले दशक में (1996-2016) भारतीय अर्थव्यवस्था, अपने आकार में दस गुना बढ़ी है, (स्रोत- आइएमएफ 28.04.17) क्या इस अनुपात में टैक्सदाता बढ़े? हमारा मानस बनता गया है कि सरकार को हम टैक्स न दें, पर सभी सार्वजनिक सुविधाएं विश्वस्तर की चाहिए. यह किस मुल्क में व कैसे मुमकिन है?
इन आंकड़ों से साफ है कि देश में टैक्स न देनेवाले की तादाद बढ़ी है. अब टेक्नोलॉजी (आधार क्रियान्वयन) के बल पर टैक्स चोरों को पकड़ने की जो संभावना बन रही है, उसे निजता और प्राइवेसी के नाम पर रोकना चाहिए? मशहूर पत्रिका फ्रंटलाइन का अंक (28 अप्रैल 2017) आधार पर विशेषांक है.
‘आधार का हमला’ कवर पर शीर्षक है. सारांश है कि आधार को अनिवार्य बनाकर केंद्र सरकार सब्सिडी के लाभ, कल्याणकारी योजनाओं के लाभ या अन्य सरकारी योजनाओं को इससे जोड़कर, संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त अधिकार पर हमला कर रही है.
