देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में भारी बारिश से जन-जीवन अस्त-व्यस्त है. ऐसे में यह सवाल जरूरी है कि हमारे देश में आपदा-प्रबंधन चुनौती की स्थिति में अक्सर लचर और लाचार क्यों नजर आता है? मुंबई में बारिश से बाढ़ साल 2005 की जुलाई में भी आयी थी. तब 12 घंटों में 644 मिलीमीटर बारिश हुई, इस बार इतने ही समय में 315 मिलीमीटर बारिश हुई, लेकिन हालात की भयावहता 2005 जैसी जान पड़ती है.
सो, खोट आपदा-प्रबंधन के तंत्र में खोजे जाने चाहिए. क्या मुंबई का स्थानीय प्रशासन इस बुनियादी तथ्य को नहीं जानता कि पानी अपना तल खुद ढूंढ़ लेता है और ठीक इसी तर्क से बारिश का पानी कहीं ठहरता नहीं, बशर्ते उसके निकलने की राह न रोकी गयी हो?
क्या मुंबई का प्रशासन इस बात से बेखबर है कि मौसम का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और उसकी गंभीरता को भांपते हुए लोगों को चेतावनी जारी की जा सकती है? आपदा-प्रबंधन से जुड़ी ये बुनियादी बातें हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने इन बातों की अनदेखी की.
जल-निकासी की पूर्व तैयारी अगर हमारे सोच में न हो, नगर-निर्माण की हमारी योजनाओं में प्राथमिक न मानी जाये या फिर स्थानीय प्रशासन जल-निकासी की जिम्मेदारियों से निहित स्वार्थों के कारण कन्नी काटे, तो मुंबई-चेन्नई जैसे महानगर हों या फिर असम के धुबरी और गुजरात के बनांसकांठा जैसे ग्रामीण अंचल- सबको तेज बारिश की स्थिति में बाढ़ की विभीषिका झेलनी होगी. इस साल बिहार, बंगाल, असम, मणिपुर, राजस्थान और गुजरात में बाढ़ का विशेष असर दिखा, आपदा-प्रबंधन की तैयारियां बदस्तूर लचर दिखीं.
पहली जरूरत वैसे उपाय करने की है कि बाढ़ के हालात न पैदा हों. बाढ़-नियंत्रण की योजनाओं की समीक्षा पर केंद्रित सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि ऐसी योजनाओं का न तो समय पर क्रियान्वयन हो पाता है और न ही क्रियान्वयन के लिए जरूरी मानी गयी शर्तों का पालन होता है.
सीएजी ने 17 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की बाढ़-प्रबंधन से जुड़ी 206 परियोजनाओं, 38 बाढ़-पूर्वानुमान के केंद्र और 49 नदी-प्रबंधन से संबंधित योजनाओं की समीक्षा के आधार पर कई खामियां गिनायी हैं. मॉनसून की बारिश और बाढ़ से अगर सालाना औसतन 1600 लोगों की जान जाती है और देश 1800 करोड़ रुपये की संपदा का नुकसान झेलता है, तो इसका कारण नदी के प्रवाह और बारिश के पानी के जमाव और निकास को लेकर हमारे अवैज्ञानिक सोच और अकुशल प्रबंधन-तंत्र में छुपा है.
सुधार की शुरुआत इसी स्तर से करनी होगी. उम्मीद की जानी चाहिए कि इतनी तबाही के बाद हमारी सरकारों के रवैये में सकारात्मक बदलाव आयेगा.
