मृदुला सिन्हा
राज्यपाल, गोवा
तीन वर्ष पूर्व जब मेरे कार्यकाल का दूसरा महीना आया था, मेरे सहयोगियों ने मुझे सूचना दी कि तालीगांव (गोवा) से कुछ लोग आयेंगे ढोल-नगाड़े के साथ आपको धान की बालियां भेंट करेंगे. यह फसल कटाई का एक त्योहार है. आपस में प्रसन्नता का आदान-प्रदान होगा.
क्योंकि फसल की बुआई से लेकर कटाई तक उत्सव का ही मन होता है. इसलिए कि अन्न से जीव मात्र का पेट भरता है. किसान जब खेत में बीज डालने के अरसे बाद कटाई करने जाता है, उस बीच न जाने कितने पशु-पक्षी उस अन्न का अंश खाते हैं. कभी-कभी बड़ा अंश बर्बाद भी करते हैं, तो कभी प्राकृतिक आपदाओं से भी लहलहाती फसल बर्बाद हो जाती है. किसान के लिए कुछ भी नहीं बचता. किसान सब सह लेता है. अगले साल फिर फसल आयेगी, इस आशा के साथ फिर बुआई करता है.
तालीगांव (गोवा) के द्वारा पहली कटाई कौनसाचें फीस्ट धूमधाम से मनाना मुझे भी आनंदित कर गया. किसान परिवार की बेटी और बहू होने के कारण मैं उनके आनंद और अवसाद के कारणों से भीग गयी हूं. यह त्योहार तो चर्च में मनाया जाता है. अर्थात ईसाई धर्म में फसल की कटाई को ईश्वरीय देन मानकर उत्सव मनाया जाता है.
वेद में कहा गया है- हे ईश्वर! तुम्हारा दिया हुआ वस्तु तुम्हें ही समर्पित करता हूं. फसल जो मनुष्य के परिश्रम और ईश्वर की कृपा से उगती है, किसान के घर को भरती है, वह ईश्वरीय देन है.
इसलिए सर्वप्रथम चर्च में धान की बालियों को भेंट करना, तत्पश्चात् गोवा के आर्कबिशप (गोवा के ईसाई धर्मगुरु) तथा राजभवन में राज्यपाल को भेंट करना भी उत्सव का ही हिस्सा है. सुबह के 6ः30 और 8 बजे तक प्रार्थना सभा और 9ः30 बजे जनसमूह त्योहार का उत्सव मनाते हैं. शाम के समय कोंकणी कंटारांची नाम से संगीत का आयोजन होता है.
वेद के अनुसार, अन्न ज्यादा से ज्यादा उगाना चाहिए. कोई भी किसान सिर्फ उतना ही अन्न नहीं उगाता, जितने कि उसके परिवार के लिए जरूरत है.
सच बात तो यह है कि वह अपने पालतू पशु-पक्षियों के लिए भी अन्न उगाता है. हिंदू परिवारों में भी फसल की कटाई पर बहुत उत्सव मनाया जाता है. ओणम का त्योहार, असम में बिहू, बिहार में अन्न का नेमान करना, मकर संक्राति पूरे देश में अलग-अलग उत्सव के रूप हैं, लेकिन भाव एक ही है. ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना. इसलिए कहा गया है कि अन्न की निंदा मत करो. अन्न को ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए.
हमारे जीवन में अन्न की महत्ता को समझने के लिए ग्रामीण जीवन को देखना आवश्यक होगा. मैंने देखा हुआ है. जिस स्थान पर सैंकड़ों मन धान झार कर उठाया जाता था. खलिहान में झाड़ू तक लग जाता था.
उस खलिहान में बैठकर मेरे ससुर जी बहुत देर तक छोटे-छोटे गड्ढे में छुपे धान के दानों को चुनते थे. सौ मन धान के संचयन के बाद दो मुट्ठी धान की क्या उपयोगिता थी. यह बात तो बाद में पता चली कि वह दो मुट्ठी धान का वजन नहीं, उसके पीछे छुपा किसान का भाव था- अन्न बर्बाद नहीं करना. गांवों में भोजन के बाद थाली में अन्न छोड़ना वर्जित था. थाली में कुछ दाने छूट जायें, तो उसे सलीके से उठा लिया जाता था और उस बर्तन में डाला जाता था, जिस बर्तन में पशुओं को खिलाने के लिए दाना रखा जाता था.
मैं छात्रावास में पढ़ती थी. वहां की संचालिका भोजन के समय प्रतिदिन भोजनालय में उपस्थित रहती थीं. वे हमेशा दुहराती थीं कि तुम लोग थाली में अन्न छोड़ती हो, तो मुझे रोना आता है. यह सुनकर हमें बहुत हंसी आती थी. उनके मन का दर्द कहां समझ में आता था. उसे समझने के लिए उनकी आयु तक पहुंचना आवश्यक था. आज अन्न फेंकनेवालों में ज्यादातर वही लोग हैं, जो अन्न उपजाते नहीं, केवल खाते हैं.
इस बार भी बिहार में आयी बाढ़ में हजारों एकड़ जमीन में धान की फसल बह गयी. किसान इसे भी ईश्वर का प्रकोप मानकर बर्दाश्त कर लेंगे. लेकिन, सोचकर इतना दुख होता है कि उतने धान से कितने लोगों के पेट भरते. फसल से भरे खेत, फल से भरे वृक्ष, जल से भरा स्थान देखकर प्रसन्नता होती है. खेत किसी का हो फसल अच्छी होनी चाहिए. अच्छी फसल देखकर हम प्रसन्न हो जाते हैं. क्या कारण है? कारण स्पष्ट है कि जीव मात्र को अन्न चाहिए, जल चाहिए.
यह सब यदि ईश्वर ने दिया है, तो संवेदना रखनेवाला मनुष्य इसलिए प्रसन्न होता है कि सबका पेट भरेगा, सबकी प्यास बुझेगी और इस भाव को छुपाये हुए भी किसान फसल कटाई का त्योहार मनाता है.
चर्च और मंदिर में भगवान के स्थानों पर फसल चढ़ाता है. फसल की रोपाई और कटाई में लगे मजदूरों को भोज खिलाता है. अधिक पारिश्रमिक देता है. उसके घर में भगवान के प्रसाद के रूप में अन्न जो आया है. यहां यह भी विश्वास जमता है कि चर्च और मंदिर, हिंदू और ईसाई में फर्क नहीं है. भगवान को पूजने का ढंग भले ही अलग हो. कृतज्ञता का भाव तो एक ही है.
