राम रहीम को मिली सजा ने साफ कर दिया है कि देर से ही सही पर अपराधी को सजा मिलती ही है. लेकिन यहां सोचने वाली बात है कि कब तक हम धर्मांध बने रहेंगे. धर्म के नाम पर कब तक ये पाखंडी अपनी रोटियां सेंकते रहेंगे? आखिर क्यों लोग इतनी आसानी से इन जैसे लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं.
आशाराम, रामपाल और राम रहीम इन तीनों के समर्थकों ने उत्पात मचाया. समझ में नहीं आ रहा कि लोग कैसे इतने अंधे हो गये हैं कि उन्हें सही गलत का फर्क समझ नहीं आ रहा. अपनी परेशानियों में ऐसे बाबाओं के पास जाने से इनका मनोबल बढ़ता ही है. पढ़े लिखे लोग भी विवेकशून्य हो जाते हैं. अगर अब भी लोगों ने सबक नहीं सीखा, तो उनका कोई भी भला नहीं कर सकता.
डॉ शिल्पा जैन सुराना, वारंगल, इमेल से
