बिहार के मुख्यमंत्री ने ‘जरूरत और लालच’ के जुमले को अपना हथियार बना लिया है. जरूरत और लालच के बीच की महीन लकीर ही इंसान की जरूरत को लालच बना देती है. नीतीश कुमार ने हाल के सत्ता परिवर्तन को ‘जरूरत’ बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, मगर कहीं-न-कहीं इसमें लालच की बू तो आती ही है.
बिहारियों के ‘डीएनए’ पर सवाल करनेवाली पार्टी को एक झटके में छोड़ कर भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी पार्टी के साथ सत्ता में बने रहना क्या लालच से इतर था? यह ‘पद्म-आसन’ ‘क्षीर-सागर’ में नहीं, जो यहां कीचड़ के छींटे नहीं पड़ेंगे. सुशासन की इस ‘जरूरत’ ने ही बिहारी ‘डीएनए’ की बलि ले ली. अच्छा होता, सत्ता छोड़, जरूरत और लालच के बीच फर्क करना बिहारवासियों पर छोड़ दिया जाता.
एमके मिश्रा, रातू, रांची
