तभी भारत की जय होगी

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार पंद्रह अगस्त को हमने अपनी आजादी की 70वीं सालगिरह मनायी है. देश के प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर हम सबकी ओर से देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को हमेशा याद रखने की कसम खायी है. लेकिन, हम इस शपथ को पूरा कैसे करेंगे? इस सवाल का पहला […]

विश्वनाथ सचदेव
वरिष्ठ पत्रकार
पंद्रह अगस्त को हमने अपनी आजादी की 70वीं सालगिरह मनायी है. देश के प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर पर खड़े होकर हम सबकी ओर से देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों को हमेशा याद रखने की कसम खायी है. लेकिन, हम इस शपथ को पूरा कैसे करेंगे? इस सवाल का पहला और सबसे महत्वपूर्ण उत्तर यह है कि सबसे पहले हम स्वयं को सिर्फ भारतीय समझें. भारतीय जो इस देश के सभी धर्मों, सभी समाजों, सभी भाषाओं, सभी संस्कृतियों के प्रति आदर का भाव रखता है और यह मानता है कि मैं ही वह भारत हूं, जो बन रहा है.
समग्रता की यह भावना ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है. सबका साथ, सबका विकास का नारा जब हम लगाते हैं, तो उसमें यह बात अंतर्निहित है कि हम किसी को इसलिए शक की नजर से नहीं देखेंगे कि उसका धर्म और भाषा हमसे भिन्न है.
रंग-बिरंगे फूलों वाला गुलदस्ता है हमारा भारत. अलग-अलग रंगों और अलग-अलग खुशबुओं वाले फूल इस गुलदस्ते को आकार भी देते हैं और सार्थकता भी. हमें इस भिन्नता पर गर्व करना चाहिए, और इसका सम्मान भी करना चाहिए. लेकिन, दुर्भाग्य से, कुछ तत्व हैं, जो इस विभिन्नता की सुंदरता और सार्थकता को समझना नहीं चाहते.
इसीलिए, कभी कोई किसी की देशभक्ति पर शक करने लगता है और कभी किसी को राष्ट्र के प्रति अपना प्यार और सम्मान दूसरे के ऐसे ही प्यार-सम्मान से ज्यादा अच्छा और सच्चा लगने लगता है. किसी अन्य की देशभक्ति पर संदेह करने से पहले हम में से हर एक को अपने भीतर झांक कर देखना चाहिएö मैं कितना देशभक्त हूं.
आखिर क्या मतलब है देश की जय का? इसका मतलब है देश के विचार की समझ, और उसे साकार करने की उमंग. गुलदस्ते के सारे फूलों की सुंदरता और सारी खुशबुओं को सहेजकर रखने की हमारी ईमानदार कोशिश ही हमारी देशभक्ति का प्रमाण हो सकती है, देश की जय को सुनिश्चित कर सकती है.
इस कोशिश का तकाजा है कि हम उन सारी ताकतों के खिलाफ खड़े हों, जो हमें बांटने की कोशिश में लगी हैं. हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध आदि सब जब मिलते हैं, तो हम बनते हैं. ये सब उस शरीर के अंग हैं, जिसे हम भारत कहते हैं. शरीर का हर अंग महत्वपूर्ण ही नहीं है, बराबरी के महत्व वाला भी है. यह बात हमारी सोच का हिस्सा बननी चाहिए, हमारी समझ का आधार बननी चाहिए. तभी भारत की जय होगी, तभी ‘जय हिंद’ का नारा सार्थक होगा.
खान-पान, पहनावा, पूजा की विधियां आदि तो ऊपरी चीजें हैं. महत्वपूर्ण तो सोच है. भावना महत्वपूर्ण है. भाईचारे की भावना का तकाजा है कि हम धर्म के नाम पर देश को बांटने की साजिशों को नाकामयाब बनाने के प्रति सदैव जागरूक रहें.
हमारी हर संभव कोशिश होनी चाहिए कि सवा सौ करोड़ हम भारतीयों में से कोई एक भी स्वयं को असहज महसूस न करे, किसी एक को भी न लगे कि वह असुरक्षित है. इसके लिए जो कुछ अपेक्षित है, वह सब हमें करना होगा. तभी भारत की जय होगी. तभी हम परिपक्व बनेंगे.
जनतांत्रित व्यवस्था में जिन मानकों से परिपक्वता नापी जाती है, उनमें प्रमुखता विकास के प्रयासों और उसके परिणामों में जनता की भागीदारी की है. इस दृष्टि से देखें, तो पिछले सत्तर सालों में हमने बहुत कुछ पाया है. पर, उससे कहीं अधिक पाना अभी शेष है. सत्तर सालों की हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं.
लेकिन, विकास का मतलब सिर्फ उपलब्धियां नहीं होता. व्यक्ति के रूप में, राष्ट्र के रूप में, समाज के रूप में, हम कल जहां थे, वहां से कितना आगे पहुंचे हैं?
विवेक के मानकों की दृष्टि से कितने पायदान ऊपर हैं हम कल की तुलना में? विविधता में एकता की अपनी बुनियादी ताकत के बारे में कितने जागरूक हैं हम? समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता के जन आदर्शों की नींव पर हमने एक नये भारत की रचना का संकल्प अपने संविधान को अंगीकृत करते समय लिया था, उस दिशा में हम कितना आगे बढ़ पाये हैं? हमने एक पंथ-निरपेक्ष, समाजवादी समाज की रचना का सपना देखा था, उस सपने को पूरा करने के लिए हम कितनी ईमानदारी से प्रयत्नशील हैं?
धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर बांटने और बंटने की साजिशों को हम किस सीमा तक विफल कर पाये हैं? क्या यह सच नहीं कि हम आज भी सांप्रदायिकता से मुक्त नहीं हो पाये हैं? भाषा के नाम पर आज भी एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं? आखिर क्यों? ढेर सारे सवाल हैं और ये सब हमसे जवाब मांग रहे हैं.
यह देश सवा अरब भारतीयों का है. इस देश के इतिहास, संस्कृति, विरासत और इसकी संपदा पर इन सवा अरब भारतीयों में से हर एक की हिस्सेदारी है.
यह देश हमारा साझा है, यह समाज हम सबसे मिलकर बना है. फिर इस सब पर किसी का कम या ज्यादा अधिकार कैसे हो सकता है? हमारे अधिकार साझे हैं, हमारा दायित्व साझा है. सवाल है क्या हम अधिकार और दायित्व के इस समीकरण को समझते हैं? यदि हां तो फिर धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण के नाम पर आये दिन विवाद क्यों उठते हैं?

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