गोरखपुर में मासूमों की मौत ने देश में खलबली मचा दी है. मौतें पहले भी हुईं हैं, मगर कम्बख्त ‘ऑक्सीजन’ ने मासूमों की जान ले कर राजनीतिक गलियारे में जान डाल दी है. बहस इस बात पर रुक गयी कि ज्यादा संवेदनशील कौन है. हुजूर! संवेदनशीलता की मौत तो हर क्षण हो रही है, वरना अगस्त में मौत के आंकड़ों को बीच में आने की जरूरत ही क्या थी?
विशालकाय सरकारी अमला, जन-नायकों की लंबी कतार है, फिर भी ऑक्सीजन की किल्लत का पता नहीं चल सका! काश, ‘सफेद हाथियों’ की भी कोई जमीर होती. अपने हाथों से फिसलती बच्चों की जान बचाते मां-बाप ऑक्सीजन पंप दबाते ही रहे और चिराग बुझ गया. क्या इन मासूमों के लिए भी तिरंगा झुकाया जायेगा? सवाल बहुतेरे हैं, मगर जवाब सिर्फ एक है, ‘यह मासूम भारत की मौत है’.
एमके मिश्रा, रातू, रांची
