‘काली तेरी चोटी है’ एक मशहूर गाना है, मगर उन काली चोटियों का क्या हो जो सरेआम कट रहीं हैं. तेजी से फैलती ‘चोटीकटवा’ की खबरों ने देश को अचानक ही ‘एक्टिव’ कर दिया. सीमा पर खड़े चीनी सैनिक हमें क्या खाक डरायेंगे! डर, जो चोटीकटवा ने पैदा किये हैं, उस खौफ में हम रात भर जग रहे हैं.
जाने वह शातिर कोई चुड़ैल-पिशाच है या हमारा ही वहम. 90 के दशक में ‘मुंहनोचवा’ ने भी कुछ ऐसी ही दहशत फैलाई थी. ढूंढ़ने वालों को तो वह आज तक नहीं मिला, मगर सिहरन अभी भी है. आस्था, विश्वास और परंपराओं की बुनियाद पर खड़े इस देश में जब अंधविश्वास की आंधी चलती है, तो अच्छे-अच्छों की चोटियां कट जाती है.
एमके मिश्रा, रातू, रांची
