बदहाल स्वास्थ्य तंत्र

राष्ट्र के बेहतर भविष्य के निर्माण में स्वस्थ्य आबादी के योगदान और महत्व को जानते हुए भी हमारी नीतिगत लचरता बहुत चिंताजनक है. वैश्विक बीमारी के कुल बोझ का 21 फीसदी हिस्सा ढोने के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हमारा खर्च न्यूनतम स्तर पर है. देश की 48 फीसदी आबादीवाले नौ पिछड़े राज्यों में देश की […]

राष्ट्र के बेहतर भविष्य के निर्माण में स्वस्थ्य आबादी के योगदान और महत्व को जानते हुए भी हमारी नीतिगत लचरता बहुत चिंताजनक है. वैश्विक बीमारी के कुल बोझ का 21 फीसदी हिस्सा ढोने के बावजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हमारा खर्च न्यूनतम स्तर पर है. देश की 48 फीसदी आबादीवाले नौ पिछड़े राज्यों में देश की 70 प्रतिशत शिशु मृत्यु और 62 प्रतिशत मातृ मृत्यु होती हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई की भी तसवीर कम बदरंग नहीं है. एक हालिया स्वास्थ्य सर्वे में बताया गया है कि दिल्ली और मुंबई में हर साल डायरिया, हाइपरटेंशन, टीबी और डेंगू के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. दिल्ली में रोजाना टीबी से लगभग 10, तो मुंबई में 18 मौतें होती हैं. ऐसी बीमारियों से मरनेवालों में ज्यादातर लोगों की आयु 15-44 वर्ष के बीच होती है. देश के दूरदराज के इलाकों में समुचित स्वास्थ्य व्यवस्था की कल्पना भी कैसे की जाये, जब दिल्ली में प्रदेश सरकार और निगम अस्पतालों में 40 प्रतिशत मेडिकल और 45 प्रतिशत पैरामेडिकल स्टाफ की कमी है. बीमारियों का बढ़ता जोखिम और लचर स्वास्थ्य सेवाओं से निपटने के लिए प्रयास तो किये गये, लेकिन बड़ी आबादी के लिए अच्छे नतीजे का इंतजार फिलहाल बना ही हुआ है. साल 2005 में भारत सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य मोर्च पर विफल रहे राज्यों की विशेष सूची तैयार की थी, जिसमें बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और असम शामिल थे. वर्ष 2014-15 के आरबीआइ आंकड़ों के अनुसार, बिहार का सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर खर्च मात्र 3.8 प्रतिशत रहा. बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और झारखंड आदि राज्यों के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की 80 से 90 प्रतिशत तक की कमी है.
बड़ी संख्या में गरीब जनता इन स्वास्थ्य केंद्रों पर आखिरी उम्मीद लिये पहुंचती है, लेकिन व्यवस्थागत लाचारी से जूझते केंद्रों पर निराशा ही उनके हाथ लगती है. पिछले दो दशकों में विभिन्न सरकारों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोई खास तवज्जो नहीं दी. भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कुल घरेलू उत्पादन का मात्र 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जो कि ब्रिक्स देशों में न्यूनतम है.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2015 के मसौदे के अनुरूप 2020 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक करने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए व्यापक और असरकारक फैसला करना होगा. शहरों से लेकर दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित कर ही एक विकसित और समृद्ध भारत का निर्माण संभव है.

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