क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
क्या करे, बेचारे की सौतेली मां है. पहले अकसर ऐसी बातें घर की महिलाओं से किसी बच्चे के बारे में सुनायी देती थीं. साथ ही सौतेली मां के अत्याचारों की कहानियां भी घर-घर कही जाती थीं. लेकिन, अब जैसे वक्त बदल गया है. अब ऐसा कहीं सुनायी नहीं देता.
एक परिचित लड़की को एक तलाकशुदा आदमी से प्यार हो गया. उसके दो बच्चे भी थे. जब दोनों का विवाह हुआ, तो बच्चे छोटे थे. वे बच्चे अपनी नयी मां के पास आने से कतराते थे. आसपास वाले भी हमेशा उनके बहाने नयी मां की परीक्षा लेते रहते.
मगर, उस लड़की ने जैसे ठान लिया कि इन बच्चों का दिल जीत कर रहेगी. धीरे-धीरे वह उन दोनों के हर काम में दिलचस्पी लेने लगी. खाने में उन्हें क्या पसंद है, टीवी पर कौन सा कार्यक्रम पसंद है. उन्हें स्कूल बस पर छोड़ने और लाने का काम करने लगी. धीरे-धीरे उनके साथ खेलने भी लगी. टीचर्स-पेरेंटस मीट में जाने लगी. बच्चों का होमवर्क ठीक समय पर हो, वे सही समय पर सो जायें, इन सबका ध्यान रखने लगी. धीरे-धीरे हुआ यह कि बच्चे पिता को भूल मां-मां चिल्लाने लगे. वे कहीं भी जाते उन्हें मां चाहिए थी. वे बच्चे अब बड़े हो गये हैं, मगर अपनी इस मां के बिना नहीं रह सकते.
दूसरा किस्सा भी ऐसी ही एक मां का है. उसके पति का निधन हो गया. एक बच्ची भी थी. एक साल बाद उसकी ऐसे आदमी से शादी कर दी गयी, जिसका एक बेटा था. नये घर में पहले-पहल उसकी बेटी को एडजस्ट करने में दिक्कत हुई, मगर जल्दी ही दोनों बच्चे मिल-जुल कर रहने लगे. एक-दूसरे के साथ को दोनों पसंद करने लगे. माता-पिता का भरपूर सहयोग मिला, तो दोनों पढ़ने में भी बहुत अच्छे निकले. आज अपनी पढ़ाई पूरी करके दोनों बहुत अच्छी नौकरियां करते हैं.
वैसे तो हमारे समाज में सदियों से सौतेली मां के अत्याचार की कथाएं कही-सुनी जाती हैं. एक जमाने में वे किसी हद तक सच भी होती थीं. मगर, बदले वक्त ने जैसे इन कहानियों को बदल दिया है.
पहले तो बच्चे की मां की मृत्यु के बाद ही उसे सौतेली मां का सामना करना पड़ता था, लेकिनआजकल संबंध जल्दी टूट रहे हैं. तलाक बड़ी संख्या में बढ़ रहे हैं. पहले बच्चों के कारण जोड़े तलाक नहीं लेते थे, मगर अब ऐसा नहीं है.
जाहिर है कि विवाह विच्छेद के बाद ये लोग दोबारा विवाह करते हैं. इनकी कोशिश होती है कि जीवनसाथी उसे ही चुनें, जो इनके बच्चे के साथ भी अच्छी तरह से पेश आये. इस तरह जिस बच्चे की मां नहीं है या जिसका पिता नहीं है, उसे भी माता-पिता के दोबारा विवाह के बाद यह कमी नहीं महसूस होती. ऐसे परिवारों में अपने-पराये बच्चे का भेद तो मिट ही गया है, बल्कि सौतेले माता-पिता की छवि भी बदल गयी है.
