राष्ट्रपति प्रत्याशी के चयन में सत्तापक्ष व विपक्ष ने दलितों के प्रति जो दरियादिली दिखायी है, वो तारीफ के काबिल है. भीमराव आंबेदकर भी चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों को बराबरी व न्याययिक हक मिले.
वर्षों तक भारतीय समाज में ऊंच-नीच का विष वमन होता रहा, जिसका खामियाजा देश को गरीबी और पिछड़ेपन के रूप में भुगतना पड़ रहा है. देर से ही सही, दलों की सोच में बदलाव आया है. अब पक्ष और विपक्ष को अपने दल से कोई दलित चेहरा को आगे कर अगले लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए. दोनों ही दलों में ऐसे चेहरे की कमी नहीं है, तब ही दलित प्रधानमंत्री बनने का रास्ता बन सकेगा.
बैजनाथ प्रसाद महतो, हुरलुग, बोकारो
