डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
झारखंड की महामहिम राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने सीएनटी-एसपीटी एक्ट में रघुवर दास सरकार द्वारा किये गये संशोधन बिल को वापस कर दिया. इसके तुरंत बाद हुई जनजाति परामर्शदातृ समिति की बैठक में रघुवर सरकार पीछे हटती हुई दिखाई दी, लेकिन अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ. पिछले साल नवंबर में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में हुए संशोधन के खिलाफ झारखंडी-आदिवासी समुदाय में गुस्सा भड़क उठा था और तब से लगातार जनआंदोलन हो रहे थे. सरकार ने सीएनटी की धारा- 21, 49 (1), 49 (2), 71, एवं एसपीटी की धारा- 13 में संशोधन का बिल तैयार किया था. इसमें कृषि भूमि का गैर कृषि भूमि में रूपांतरण सबसे आपत्तिजनक माना जा रहा था.
सीएनटी-एसपीटी अधिनियम झारखंड का बेहद संवेदनशील मुद्दा है. इस अधिनियम का संबंध आदिवासियों-मूलवासियों के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है. ध्यातव्य होना चाहिए कि सीएनटी, एसपीटी या विल्किंसन रूल जैसे भूमि संबंधित कानून की पृष्ठभूमि में आदिवासियों की लंबी लड़ाई और कुर्बानियां हैं. औपनिवेशिक समय में आदिवासियों द्वारा किये गये विद्रोह, लगातार हमलों और असहमतियों के बीच शांति का सूत्र खोजने के लिए अधिकतर कानून बनाये गये थे.
सन 1872 में बना ‘संताल परगना बंदोबस्त विनियम’ का उद्देश्य ही लिखा गया था- ‘संताल परगना के रूप में ज्ञात प्रदेश में शांति और सुशासन के लिए.’ सन 1855 के ‘महान हुल’ के बाद औपनिवेशिक शासन को इस पर गंभीरता से विचार करना पड़ा था. औपनिवेशिक समय में आदिवासी हितों को ध्यान में रख कर बनाये गये कानून को ही आजादी के बाद संविधान में उसी प्रारूप के साथ या कुछ परिष्कृत नये रूप में शामिल किया गया. जब ये कानून बने थे, तब समाज में उत्पादन और आजीविका का मुख्य आधार कृषि था.
अब समाज में उत्पादन और आजीविका का आधार तेजी से बदला है. फिर भी जमीन का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उसकी उपज के आधार पर उसका महत्व और बढ़ गया है. अब उपज दो तरह की हो गयी है- कृषि उपज और उद्योग-खनन. अब इन अधिनियमों में संशोधन की बात औद्योगिक-व्यावसायिक उपज को लेकर हो रही है न कि कृषि उपज को लेकर. इसी के साथ हितों का टकराव सामने आ रहा है.
वर्ष 1908 में या उसके आस-पास हमारे देश में औद्योगिक पूंजीवाद स्थापित नहीं हुआ था. यह आजादी के बाद से लगातार न केवल मजबूत हुआ है, बल्कि नवउदारवाद के दौर में यह तेजी से स्थापित हुआ है. औपनिवेशिक समय में अंगरेजी, जमींदारी और महाजनी व्यवस्था आदिवासी समाज को उसकी जमीन से बेदखल कर रही थी. आजादी के बाद लगभग यही बेदखली कानून के द्वारा या उसके संशोधन के द्वारा हो रही है.
आज की वैश्विक दुनिया में पूंजीवाद हमारे समाज में न केवल जड़ जमा चुका है, बल्कि वह अपने हिंसक जबड़ों से प्रकृति और उसके संसाधनों को महाजनों की तरह दबोच लेने के लिए लालायित है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह सब कुछ लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर कानूनन हो रहा है. ऐसी परिस्थितियों में आदिवासी हितों को लेकर बने कानूनों को शिथिल करने का औचित्य क्या है?
आमतौर पर यह सवाल किया जाता है कि सीएनटी एसपीटी जैसे कानून विकास में बाधक हैं. न केवल देश के विकास में, बल्कि खुद आदिवासियों के विकास में भी बाधक हैं. ऐसी बेबुनियाद बातें दो तरह के लोग कहते हैं- एक, जमीन के बिचौलिए आदिवासी एवं गैर-आदिवासी. दूसरे वे, जो देश में विकास की प्रक्रियाओं को समझना नहीं चाहते. दरअसल, वे राजनीतिक जुमले तैयार करते हैं. सीएनटी एसपीटी और विकास के मुद्दे को समझने के लिए झारखंड के आदिवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग की रिपोर्ट को पढ़ा जाना चाहिए.
डुंगडुंग अपनी रिपोर्ट में कहते हैं- ‘सरकार का एक तर्क यह है कि सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट राज्य के विकास के लिए बाधक हैं. लेकिन यह तर्कसंगत नहीं है. सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट के अस्तित्व में रहते हुए झारखंड में प्रतिवर्ष 15,000 करोड़ रुपये मूल्य के खनिज का उत्खनन होता है, जिसमें कोयला, लौह-अयस्क, बाक्साइट प्रमुख हैं. राज्य में औद्योगिक विकास जारी है.
1951 से 1995 तक झारखंड में कुछ महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाई स्थापित की गयी, जिसमें बोकाराे स्टील प्लांट, सिंदरी खाद कारखाना, भारी इंजीनियरिंग निगम रांची, तांबा स्मेलटर घाटशिला, यूसीआइएल तथा कई खनन उद्योग. करीब 90 बड़े बांध, 400 मध्यम तथा 11,878 छोटे बांध बनाये गये, जिसमें चांडिल की स्वर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना, दुमका की मयूराक्षी जलाशय परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, पलामू की कुटकू जलाशय परियोजना प्रमुख हैं.
इन परियोजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण जरूरत से कहीं ज्यादा हुआ. इनमें औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए 1,75,730.18, थर्मल पावर हेतु 6,026.78, खान खनन कार्य के लिए 5,15,124.59, प्रतिरक्षा प्रतिष्ठान हेतु 1,12,289.11, जलाशय परियोजना हेतु 5,07,952 हेक्टर व अन्य परियोजना के नाम पर 1,78,824, कुल 14,95,947.04 हेक्टर जमीन का अधिग्रहण हुआ. किस आधार पर सरकार कह रही है कि ये कानून विकास में बाधक हैं?’ दरअसल, लोगों को भ्रमित कर सरकार आदिवासियों के अस्तित्व को ही समाप्त करने की साजिश कर रही है.
संविधान निर्माण के दिनों में वैरियर एल्विन ने नेहरू से कहा था कि आदिवासियों के विकास के लिए उनके क्षेत्र में बाहरी जनसंख्या के दबाव को नियंत्रित किया जाये, अन्यथा उनकी संस्कृति और अस्तित्व नष्ट हो जायेगा. आज वह दबाव पूंजीवाद के रूप में सामने है, जो आदिवासी क्षेत्रों में संवैधानिक हितों की अनदेखी कर बाहरी जनसंख्या का असंतुलित आयात कर रहा है.दरअसल, सीएनटी-एसपीटी का मुद्दा जमीन की लूट और उसकी लड़ाई से जुड़ा हुआ है.
अब लोग यह कह रहे हैं कि क्या राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने खुद आदिवासी होने के नाते संशोधन पर आयी आपत्तियों के मद्देजनर उसे विचारार्थ सरकार को वापस कर दिया है, या केंद्र से भाजपा हाइकमान का निर्देश था? क्योंकि इसमें संशोधन की बात आते ही भाजपा के खिलाफ आदिवासियों की नाराजगी खुल कर सामने आयी है, जो भाजपा के मिशन-19 के लिए शुभ संकेत नहीं है.
