।। आकार पटेल।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
आम तौर पर यह माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी अपने प्रचार अभियान में सांप्रदायिक संदर्भो से अलग रहे हैं. उनका फोकस कांग्रेस की अक्षमता और उसके वंशवाद पर, और कुछ हद तक राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का विरोध कर रही क्षेत्रीय ताकतों पर केंद्रित रहा है. यह सही है कि इस राह को अपनाने की वजह से मोदी का लहजा बहुत आक्रामक हो गया है. वे सिर्फ भाजपा के विरोधी की हार भर नहीं, बल्कि कांग्रेस-मुक्त भारत चाहते हैं.
यह राजनीतिक विरोध को शत्रुता के दायरे में लाना है. इंटरनेट पर जारी भाजपा के ताजा विज्ञापन में उस ‘विषाणु को नष्ट करने’ की बात कही गयी है, जिससे ‘भारत पिछले 60 वर्षो से संक्रमित है.’
भाजपा को सतर्क रहना चाहिए. भावनाओं को भड़काने और फिर इससे भड़की भीड़ पर काबू न कर पाने का इसका रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. लेकिन शरारत से उसका दूर रहना राहत की बात थी अभी तक. लेकिन इस हफ्ते वे फिर उस विषय पर लौटे, जिससे परहेज शायद उनके बस में नहीं है, और जो उनके सत्ता में आने पर विदेश नीति में मुश्किलें पैदा करेगा.
मोदी ने एक जनसभा में कहा, ‘तीन एके पाकिस्तान की मदद करते हैं. पहला एके एके-47 राइफल है, जो कश्मीर में खून बहाती है. दूसरे एके एंटनी हैं, जो संसद को बताते हैं कि पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने लोगों ने हमारे सैनिकों का सिर काटा था, जबकि हमारी सेना कहती है कि ऐसा पाकिस्तानियों ने किया था.’ उन्होंने सवाल किया- ‘अपने बयान से आप किसको फायदा पहुंचाना चाहते हैं?’ इसके बाद उन्होंने उस आदमी की ओर रुख किया, जिसे अब वे एक खतरे के रूप में देखने लगे हैं- अरविंद केजरीवाल, जिनका नाम उन्होंने एके-49 रखा, क्योंकि केजरीवाल ने 49 दिनों के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.
मोदी ने कहा, ‘उनकी (केजरीवाल) पार्टी के वेबसाइट पर लगे नक्शे में कश्मीर को पाकिस्तान में दिखाया गया है. उनकी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कश्मीर में जनमत-संग्रह की मांग कर रहे हैं. पाकिस्तान इनके बयानों पर नाच रहा है. ये पाकिस्तान के एजेंट, भारत के दुश्मन, पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं.’इसमें पाकिस्तान को क्यों लाया जाना चाहिए? यह इस चुनाव में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. यह भारत का बड़ा व्यापारिक साझीदार नहीं है, और किसी भी तरह से भारत के विकास की राह में रोड़ा नहीं है. इसके साथ के अनसुलङो मसले लगभग 70 साल पुराने हैं और अभी के लिए कहीं से भी अत्यावश्यक नहीं हैं.
सच तो यह है कि दक्षिण एशिया के मुसलमानों को देशद्रोही (भारतीय मुसलमान) या दुश्मन (पाकिस्तानी और बांग्लादेशी) मानने की पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि मोदी में इतने गहरे तक पैठी है कि वे इससे बच नहीं सकते. भाजपा के मतदाता के लिए पाकिस्तान का मतलब मुसलिम है और संबंधों के दोष के कारण इसमें बेचारे भारतीय मुसलमान भी शामिल कर लिए जाते हैं.
मोदी ने अपने हर चुनाव में, यह उनका चौथा चुनाव है, अपने इस स्वाभाविक दोष को अभिव्यक्त किया है. उन्होंने गुजरातियों को ‘मियां मुशर्रफ’ और ‘मियां अहमद पटेल’ पर हमले कर के लामबंद किया है.
टेलीविजन पर बहस में एक भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि यह संबोधन हैदराबाद में अपमानजनक नहीं है, वहां मियां आदर का प्रतीक है. मैंने जवाब दिया कि यह गुजरात के लिए सही नहीं है, जहां यह बयान दिया गया था. हमारे लिए मियां शब्द यह संकेत है कि संबोधित व्यक्ति मुसलिम है और ‘हमलोगों’ से भिन्न है.
मुसलिमों के एक से अधिक शादियां करने और हिंदुओं से अधिक संतानोत्पत्ति करने के घिसे-पिटे समझ से भी मोदी जकड़े हुए हैं. एक कुख्यात संदर्भ में उन्होंने ‘हम दो हमारे दो’ के जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी नारे की तर्ज पर ‘हम पांच हमारे पच्चीस’ का प्रयोग किया था. मोदी और अन्य संघियों के लिए सभी मुसलिम पुरुष चार पत्नियों की इच्छा रखते हैं और ये सभी पत्नियां पांच बच्चे पैदा करती हैं. यह सोच ईसाइयों के बारे में भी है.
उन्होंने देश के लोगों, जिनमें अधिकतर को यह पता नहीं था या उन्होंने यह जानने की जरूरत नहीं समझी थी, को बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त, जिसे मोदी समझते थे कि वे उनके साथ कुछ अधिक कड़ाई कर रहे हैं, एक ईसाई हैं. ऐसा उन्होंने ‘जेम्स माइकल लिंगदोह’ कह कर किया, जिन्हें देशवासी तब तक सिर्फ उनके नाम के शुरुआती अक्षरों से जानते थे.
मोदी को इस चुनाव में सांप्रदायिक राह पर चलने की जरूरत नहीं है (हालांकि इसकी जरूरत उन्हें गुजरात के चुनावों में भी नहीं थी). भ्रष्टाचार, विधायिका-संबंधी कार्य और शासन में अपने रिकॉर्ड से कांग्रेस अधर में लटकी पड़ी है. स्वाभाविक रूप से मोदी को ही इसका लाभ मिल रहा है.
मात्र थोड़े-बहुत अंतर से चुनाव-पूर्व सारे सर्वेक्षण बता रहे हैं कि वे जीत रहे हैं. ऐसे में उलटी-सीधी बातों का क्या मतलब है, जब न तो उनकी जरूरत है, और मेरे विचार से, वे न ही लाभकारी हैं?
