।। रोशन किशोर।।
(विदेश मंत्रालय की संस्था आरआइएस से संबद्ध)
लोकनीति द्वारा भारत में किसानों की स्थिति पर हुए हालिया सर्वे ने खेती और किसानों की बदहाल हालत को एक बार फिर उजागर किया है. इसके प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 15 फीसदी किसान देश में किसानी को अच्छा समझते हैं और 58 फीसदी इस दुर्दशा के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को दोषी मानते हैं. करीब 70 फीसदी को बीते तीन वर्षो में फसलों की बरबादी ङोलनी पड़ी है. 62 फीसदी किसान शहर में रोजगार मिले तो खेती छोड़ देंगे. 60 फीसदी किसान बीज, खाद या कीटनाशक के लिए कर्ज लेते हैं.
हालांकि इस सर्वे के परिणाम पुराने नतीजों से ज्यादा अलग नहीं हैं, फिर भी चुनावों के ठीक पहले जारी इस रिपोर्ट पर खासी चरचा हो रही है. प्राइम-टाइम युग में अर्थशास्त्र पर आधे घंटे में कैप्सूल कोर्स देनेवाले न्यूज-रीडर और बाजार की नब्ज बतानेवाले अखबारों ने इस मौके पर फिर से वकालत की है कि खेती में व्याप्त संकट का समाधान तभी हो सकता है, जब कृषि व श्रम क्षेत्र में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को और आगे बढ़ाया जाये. मतलब साफ है- कृषि को बड़ी पूंजी के लिए खोलना तथा श्रम कानूनों को और लचर बनाना. अब भी 20 साल पुराना तर्क दिया जाता है- किसान बदहाल हैं, क्योंकि असली फायदा बिचौलिये ले जाते हैं. कृषि के बाहर रोजगार पैदा नहीं होता, क्योंकि श्रम कानून इनके आड़े आते हैं. आर्थिक सुधारों के पिछले 20 साल के दौर में तथ्य किस तरफ इशारा करते हैं, इस पर ध्यान देने का कोई प्रयास नहीं किया जाता.
जिस विकास दर को लेकर भाजपा और कांग्रेस में नूराकुश्ती चल रही है, कृषि को उसका फायदा नहीं मिला है. कृषि और सकल घरेलू उत्पाद में विकास का फासला 1991 के बाद बढ़ता गया है. पिछले दो दशकों में कृषि क्षेत्र की राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी रोजगार में हिस्सेदारी की तुलना में काफी तेजी से गिरी है. उपज के मामले में भारत ऐसे कई विकासशील देशों से काफी पीछे है, जो 1960-70 तक हमारे साथ या हमसे पीछे खड़े थे. इसके बावजूद कृषि अनुसंधान पर कृषि क्षेत्र से उत्पन्न होनेवाले सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत भी खर्च नहीं किया जाता. रिकॉर्ड उत्पादन के दावों के बीच यह कोई नहीं बताता कि देश में प्रति व्यक्ति अनाज उत्पादन और उपलब्धता का स्तर 1991 से नीचे चला गया है. बिचौलियों का रोना रोनेवाले तथाकथित अर्थशास्त्री इस बात की तरफ कभी इशारा नहीं करते कि खेती में लागत तेजी से बढ़ी है, जिसका नतीजा यह है कि दामों में बढ़ोतरी के बावजूद किसानों की माली हालत में खासा सुधार नहीं हुआ है. टर्म्स ऑफ ट्रेड के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं. बीज, खाद आदि में बड़ी कंपनियों का बढ़ता आधिपत्य, बेतरतीब रासायनिक खाद, कीटनाशकों और भूगर्भीय जल के प्रयोग ने पर्यावरण संबंधी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये हैं.
इन तमाम सवालों के जवाब प्राइम-टाइम की चरचा में सुनने को नहीं मिलते. बड़ी खुदरा कंपनियों और किसानों में भरत-मिलाप का गुणगान करनेवाले इस ओर कभी इशारा नहीं करते की अमेरिका जैसे देश में कई महत्वपूर्ण वस्तुओं में किसानों को मिलनेवाले मूल्य और खुदरा मूल्य में फासला 1970 से लगातार बढ़ा है. अमेरिका अपने कई महत्वपूर्ण कृषि निर्यात किफायती होने की बदौलत नहीं, बल्कि सब्सिडी के जरिये अंतर्देशीय मूल्य को अंतरराष्ट्रीय मूल्य से कम रख कर सुनिश्चित करता है और दूसरी तरफ अपने भाड़े के अर्थशास्त्रियों से भारत के 35 किलो अनाज देनेवाले खाद्य सुरक्षा कानून के निर्णय को अक्षम्य करार दिलवाने में और विश्व व्यापार संगठन में हमें घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ता.
बड़ी पूंजी और उसके लिए सुगम तकनीक के सहारे द्वितीय हरित क्रांति की वकालत करनेवाले लोग इस बात को भूल गये हैं कि हिंदुस्तान में किसानों की आबादी करोड़ों में है. ऐसा सोचना भी मूर्खता है कि भारत में आधुनिक कृषि का स्वरूप अमेरिकी तर्ज पर होगा, जहां बड़ी मशीनें सैकड़ों एकड़ पर खेती करती हैं और वॉलमार्ट व मोंसेंटो अनाज व बीज बेचते हैं. ऐसे में कृषि से विस्थापित जनसंख्या को और कहीं रोजगार दे पाना एक टेढ़ी खीर होगी. विडंबना है कि इस दौर में विकास तो हुआ है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ा. रोजगार में कमी का ठीकरा श्रम कानूनों के ऊपर फोड़नेवाले यह कभी नहीं कहते की देश में तकरबीन 95 प्रतिशत कामगार किसी भी श्रम कानून के दायरे में नहीं आते.
कुछ साल पहले आयी एक फिल्म ‘पीपली लाइव’ ने कृषि संकट के शिकार नत्था को गांव से भाग कर शहर में मजदूरी करने के लिए आता दिखाया था. निर्माण क्षेत्र में आज सबसे ज्यादा रोजगार सृजन हो रहा है. निर्माण क्षेत्र में यह तेजी सामयिक होती है. जब मंदी आयेगी तो लाखों नत्था दास मानिकपुरी न घर के रहेंगे न घाट के. आर्थिक नीतियों पर की जानेवाली बहस- कृषि जिसका अभिन्न अंग है- आज एक दोराहे पर खड़ी है. चुनाव ‘दूरदर्शिता’ और ‘दूर के ढोल सुहावन’ में करना है.
