कमोबेश दुनिया के हर हिस्से में रहनेवाले लोगों को कभी न कभी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना ही पड़ता है. इस मामले में बिहार अपवाद हो, ऐसा संभव नहीं. पहले ही ढेर सारी ऐसी आपदाओं का शिकार हो चुका है यह प्रदेश.यहां के लोग भूकंप और बाढ़ आदि की त्रासदी झेलते ही रहे हैं. पर, 2008 में आये कोसी के महाप्रलय की न्यायिक जांच रिपोर्ट ने एक बार फिर से महाविनाश के उस दंश को लोगों के जेहन में जिंदा कर दिया है.
चूंकि जांच रिपोर्ट सरकार के हाथों में आ चुकी है, अब गेंद उसके पाले में ही है. इस रिपोर्ट का अध्ययन कर क्या कार्रवाई करनी है, क्या कदम उठाने हैं, यह सरकार को ही तय करना है. पर, कुछ महत्वपूर्ण मसलों पर सरकार को अवश्य गौर फरमाना चाहिए. पहला तो यह कि कुसहा में 17-18 अगस्त, 2008 की रात जो कुछ हुआ, उसके लिए जिम्मेवार लोगों की पहचान तय की जाये.
कर्त्तव्य निर्वहन में उनकी गैर जिम्मेवारी के हिसाब से उनके खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई हो. अवश्य हो. इससे कोसी की विनाशलीला की भेंट चढ़ चुकी जानों और धन की वापसी तो नहीं होगी, लेकिन पिछले छह वर्षो से उस महाप्रलय का दंश झेल रहे लोगों का दर्द कम करने में एक हद तक सफलता जरूर मिलेगी. इससे उन बाढ़ पीड़ितों को भविष्य के लिए एक नया आश्वासन भी मिलेगा. सरकारी सजगता और बाढ़ कीत्रासदीसे सुरक्षा का. दूसरा महत्वपूर्ण मसला ऐसे हादसों से निबटने की तैयारी का है. दुनिया में सर्वाधिक खतरनाक बाढ़ की घटनाओं ने जितना नुकसान चीन को पहुंचाया है, उतनी क्षति शायद ही किसी दूसरे देश या जनसमूह को हुई हो. वहां लाखों जानें और अरबों का धन अप्रत्याशित रूप से खतरनाक बाढ़ के चलते काल के गाल में समा चुके हैं.
हालांकि ऐसे भू-भाग दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी हैं, जहां की आबादी बाढ़ की विभीषिकाझेलने को अभिशप्त है, अभ्यस्त है. जरूरत इस बात की भी है कि बाढ़ प्रबंधन की जो समसामयिक तकनीक दूसरे देश या जनसमूह अपना रहे हैं, उसे भी समझा जाये. ऐसी तकनीक-तरकीब अगर बिहार की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति के अनुकूल हों, तो बिहार सरकार के प्रशासनिक तंत्र को भी उन पर अमल करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाना चाहिए. इससे प्रलय की आशंका भले ही निर्मूल न हो, पर उसकी त्रासदी का डर अवश्य कम रहेगा.
