।। चंदन श्रीवास्तव।।
(एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस)
ना सही संन्यास की, तो भी साठ की उम्र वानप्रस्थ की तो होती ही है. साठ की उम्र को हमारे राजनेता सरकारी बाबुओं की तरह रिटायरमेंट की नहीं, बल्कि राजनीतिक बालपन के बीतने और सियासी तौर पर सयाने होने का लक्षण समझते हैं. साठ पार राजनेता सयाना होता है- इस बात को हाल ही में तीन नेताओं ने साबित किया है. इनमें एक हैं उत्तर प्रदेश के जगदंबिका पाल, दूसरे उत्तराखंड के सतपाल महाराज और तीसरे हरियाणा के राव इंद्रजीत सिंह. तीनों अलग-अलग राज्यों के हैं, तो भी इनमें अद्भुत समानता है. तीनों ने हाल ही में साठ की उम्र पार की है यानी इन्हें तकरीबन उसी साल के आस-पास जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त है, जिस साल यह देश गणतंत्र कहलाया और पहली लोकसभा का चुनाव लड़ा गया. दूसरे तीनों ने चंद दिनों के हेर-फेर से कांग्रेस की खिंची लीक पर जारी अपनी तीन दशक की राजनीतिक-यात्रा पर इमरजेंसी ब्रेक लगाया. तीसरी समानता यह कि तीनों को तकरीबन एक ही साथ बोध हुआ कि चुनावी वैतरणी पार करने के लिए नमो मंत्र का जाप करना जरूरी है, सो भाजपा में शामिल हो गये.
कोई कह सकता है- ‘इन नेताओं ने समय देख कर पलटी मार ली, तो इसमें विचित्र क्या है? लोकतंत्र में सबको संगठन बनाने और बदलने का हक है. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही व्यावहारिक रूप है. रहा सवाल पार्टीगत या फिर सिद्धांतगत प्रतिबद्धता का, तो कोई भी निष्ठा वहीं तक ठीक है जहां तक वह प्रयोग और परीक्षण के आड़े नहीं आती हो. भाजपा कह ही रही है कि कांग्रेस डूबता हुआ जहाज है. ये नेता कोई कांग्रेस रूपी जहाज के कैप्टन तो थे नहीं कि डूबते जहाज के साथ मर्यादा का निर्वाह करते हुए खुद भी डूबें.’ यह बात सुनने में तो ठीक लगती है, लेकिन परखने पर पुख्ता नहीं जान पड़ती. सारा कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस को जहाज कहते समय आप कैप्टन की परिभाषा का क्या करते हैं. जगदंबिका पाल कांग्रेस की तरफ से पंद्रहवीं लोकसभा में सिर्फ सांसद भर नहीं थे. जब 1998 उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बर्खास्त किया, तो जगदंबिका पाल तीन दिनों के लिए ही सही, ‘मुख्यमंत्री’ बने थे. इसके बाद वे वहां कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. क्या मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष का ओहदा कैप्टन के ओहदे के करीब बैठता नहीं जान पड़ता?
सतपाल महाराज भले जगदंबिका पाल की तरह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नहीं बन पाये, लेकिन कांग्रेस के अदने से सदस्य के रूप में राजनीतिक जिंदगी शुरू करके 25 वर्षो के भीतर वे सियासी शतरंज की गोट बिछाते-गिराते इतने प्रभावशाली हो उठे थे कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में खुद को एक दावेदार मानें. 2012 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनावों के बाद जब मुख्यमंत्री पद के लिए रस्साकशी चल रही थी, तो जोर सतपाल महाराज ने भी लगाया. वर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तब उनकी सियासी महत्वाकांक्षा पर चुटकी लेते हुए कहा था कि अच्छा हुआ जो विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने और सतपाल महाराज पद की रेस में हार गये. खैर, रेस हारने के बाद भी उनकी सियासी हैसियत इतनी तो थी ही कि उनकी धर्मपत्नी को एक पर्यटनी राज्य में पर्यटन मंत्री का ओहदा मिला. और, जहां तक सवाल हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके मशहूर राव बीरेंद्र सिंह के पुत्र राव इंद्रजीत का सवाल है, तो चार दफे की विधायकी और तीन बार की सांसदी का निर्वाह करते हुए उन्हें प्रदेश और केंद्र दोनों ही जगह मंत्री बनने का अवसर मिला. एक पार्टी के भीतर लंबा राजनीतिक जीवन बिताना और मंत्रीपद पाना इस बात की दलील है कि तीनों राजनेता पार्टी के साधारण सिपाही नहीं, बल्कि सिपहसालार थे. जब चुनावी जंग की तैयारियां चरम पर हों, तो एक सिपहसालार का पाला बदल कर शत्रुपक्ष से मिलना विचित्र तो कहलायेगा ही.
बात चाहे जितनी विचित्र लगे, मगर तीनों नेताओं की इस पलटीमार शैली की राजनीति की व्याख्या यह कह कर नहीं हो सकती कि वे अवसरवादी हैं, सो उनके लिए किसी पार्टी के सिद्धांत मायने नहीं रखते. ना ही उनके कदम को यह कह कर जायज ठहराया जा सकता है कि पार्टी बदल कर उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूर्त रूप दिया या फिर प्रयोग-परीक्षण की तुला पर कांग्रेस के आचार-विचार को खोटा पाकर उसे त्यागने के विवेक का परिचय दिया. एक तो इन नेताओं में से किसी ने अभी तक यह नहीं बताया कि भाजपा के आचार-विचार कांग्रेस से किस मायने में अच्छे हैं. दूसरे, हमारे भारतीय लोकतंत्र के भीतर राजनीतिक पार्टियों का सिद्धांतगत अंतर खत्म हो चला है- कम से कम भाजपा और कांग्रेस के संदर्भ में.
उदारीकरण के दौर में ‘राज-समाज-बाजार’ की तिकड़ी को दोनों ही दल एक ही मुहावरे से हांकने पर सहमत हैं और यह मुहावरा विकास का है. यह मुहावरा ‘मंडल और कमंडल’ की राजनीति की काट में निकला है और दोनों पार्टियों के बीच पहले से चले आ रहे अंतर को समाप्त कर रहा है. मंडल से उपजी आग ने उत्तर-भारत में अस्मितापरक क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया, तो मजबूरन दोनों ही पार्टियों को अपनी संरचना के भीतर समाज के शोषित-वंचित तबके के चेहरों को नेतृत्व के पदों पर पहले की तुलना में ज्यादा संख्या में शामिल करना पड़ा, साथ ही इन दलों के साथ अपनी दूरी को इन पार्टियों ने गठबंधन करके कम किया. ‘कमंडल’ की राजनीति ने शुरुआती दौर में भारतीय सेकुलरवाद के स्वरूप पर बहस छेड़ कर भाजपा और कांग्रेस के बीच सिद्धांत के धरातल पर मौजूद अंतर को जरूर गहरा किया था. उस दौर में भाजपा का नाम हिंदू बहुसंख्यकवाद के साथ नत्थी किया जाता था और कांग्रेस खुद को अल्पसंख्यकों का मुहाफिज कहा करती थी, लेकिन विकास का जुमला चल निकलने के बाद राजनीति का जोर धर्मगत सामुदायिक पहचानों की रक्षा या उनके हितवर्धन से ज्यादा व्यक्ति और उसकी क्षमता की बढ़ोतरी पर आ गया है. आज की तारीख में कोई पार्टी नहीं कह रही कि उसकी राजनीति नागरिक की क्षमता में बढ़ोतरी को प्रतिबद्ध राजनीति नहीं है, क्योंकि मौजूदा वक्त में ऐसा कहने का मतलब होगा उस बाजार-व्यवस्था के विपरीत जाना जो ‘ग्राहक’ को ‘राजा’ यानी अंतिम निर्णयकर्ता स्वीकार करती है. याद रहे कि लोकतंत्र का बुनियादी नियम भी यही है कि ‘राज्य’ का अंतिम निर्णयकर्ता ‘नागरिक’ है. बात को तनिक सुलझा कर कहें, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बाजार आधारित लोकतंत्र के पैरोकार हैं और उनके बीच अंतर सिर्फ नाम का है, गुण का नहीं. सिद्धांतगत अंतर के इसी अभाव में किसी राजनेता का इन पार्टियों के बीच बेखटके आवाजाही करना सहज संभव हो गया है.
