जमीनी हकीकत का बेशर्म उपहास

।। शत्रुघ्न प्रसाद सिंह।। (पूर्व सांसद एवं शिक्षक नेता) हर चुनावी मौसम में कतिपय बागी अपने-अपने बगीचे को वीरान करते रहे हैं. लेकिन, इस बार इस राजनीतिक कैंसर से प्रमुख राष्ट्रीय दल अधिक आक्रांत हैं. यह स्वाभाविक है कि जमीनी हकीकत की जहां उपेक्षा होगी वहां आक्रोश होगा. पार्टी बनाने, संगठन को अपने खून-पसीने से […]

।। शत्रुघ्न प्रसाद सिंह।।

(पूर्व सांसद एवं शिक्षक नेता)

हर चुनावी मौसम में कतिपय बागी अपने-अपने बगीचे को वीरान करते रहे हैं. लेकिन, इस बार इस राजनीतिक कैंसर से प्रमुख राष्ट्रीय दल अधिक आक्रांत हैं. यह स्वाभाविक है कि जमीनी हकीकत की जहां उपेक्षा होगी वहां आक्रोश होगा. पार्टी बनाने, संगठन को अपने खून-पसीने से सींचनेवाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं की आवाज अनसुनी करना राष्ट्रीय नेताओं की आदत में शुमार है. भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं. संसद से बिना त्यागपत्र दिये दूसरे दल की सदस्यता ग्रहण करना असंवैधानिक है. निर्वाचन आयोग, विधि आयोग और उच्चतम न्यायालय को विचार करना चाहिए कि चुनाव की अधिसूचना के साथ दल बदलने पर रोक लगायी जाये. उम्मीदवारों के आयात-निर्यात की व्यापारिक, घृणित, अनैतिक एवं असंवैधानिक अस्वस्थ परंपरा को रोकना अब अनिवार्य हो गया है, तभी जमीनी कार्यकर्ता की प्रतिष्ठा बचेगी. नेता जमीनी हकीकत का उपहास करना तभी बंद कर सकेंगे, जब दलों के टूटने व कुर्सी लोभी के दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. जनतंत्र को जिंदा बनाये रखने के लिए इस गंभीर विषय पर राष्ट्रीय बहस की शुरुआत होनी चाहिए.

आज की राजनीति जमीनी हकीकत का उपहास कर रही है. पार्टी संविधान, परंपरा, व्यवहार और लोक मर्यादा को तार-तार कर बेशर्मी का एक कलंकित अध्याय लिखा जा रहा है. जनाधार के क्षरण को रोकने के बजाय उसे और कमजोर करने की आत्मघाती रणनीति अपनायी जा रही है. 40 से 50 साल तक पंथनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्घ अचानक सांप्रदायिक और जातिवादी कुनबों में शामिल होकर महिमामंडित हो रहे हैं. क्या ये ही भारत भाग्य विधाता बनेंगे? नयी पीढ़ी की प्रेरणा के प्रसून विकीर्ण होने के पूर्व ही मसल एवं कुचल दिये जायेंगे. हताश युवा समुदाय कैसे ऐसे तथाकथित मसीहाओं को फूल चढ़ायेंगे?

राजनीति पैसे का खेल है. ऊपर से नीचे तक पैसे की ही भूख है. इस बाजार में जो जीतता है वही सिकंदर. शरीफ और गरीब राजनीति के हाशिये पर ही रहेंगे. संदूक और बंदूक बरकरार रहेगी. सजायफ्ता न सही उनकी पत्नियां संसद में महिमामंडित होंगी और एक राष्ट्रीय दल अपने गंठबंधन में उन्हें ससम्मान शामिल करने का कलंकित अध्याय जोड़ रहा है. उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद अपराध का राजनीतीकरण बदस्तूर जारी है. एक तबका दूसरे को धमका रहा है. जीते हुए स्थानों से भी उम्मीदवारों की अदला-बदली के दुस्साहसिक फैसले हो रहे हैं. मतदाताओं को धर्मोन्माद का जहर पिला कर सम्मोहित किया जा रहा है. आत्ममुग्ध राष्ट्रीय नेता अट्टहास कर रहे हैं. मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण का चौसर बिछाया जा रहा है. मजहब, जाति, उपजातियों में बांटनेवाले राष्ट्रीय एकता को ही खंडित कर रहे हैं. इस चमन में खिलनेवाले विभिन्न रंगों से रंगीन फूलों की बहुरंगी सामासिक संस्कृति से सरोकार की तिलांजलि दी जा रही है.

‘मानुष हौं तो वहीं रसखान बसौं, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वालन, जाै पशु हौं तो बसेरों करों, चरों नित नंद के धेनु मंझारन’ की महान साझी-संस्कृति का चीरहरण हो रहा है. चीरहरण देखना ही धर्मराज युधिष्ठिर की नियति है. क्या मतदाता लोकमर्यादा रूपी द्रौपदी की लाज बचाने के लिए अपनी उंगलियों से ऐसी ऊर्जा पैदा नहीं कर सकेंगे, जो किस्मत बदलनेवाले बटन को ही दबा दें? आइये, धर्म, जाति, पैसे, प्रपंच और साजिशों को बेनकाब करने का संकल्प लें. सड़कों पर निर्थक नारे बंद करें. इससे आपमें छिपी सजर्नात्मक शक्ति क्षीण होगी.

आज की मायावी दुनिया में छल संस्कृति की धूम है. समाज में शरीफ लोगों की पीड़ा, छटपटाहट के प्रति सहानुभूति गायब हो रही है. असहिष्णुता बढ़ रही है. कॉरपोरेट संस्कृति की यही परिणति है. कबीर का बाजार उठ गया है. लुकाठी लिये कोई अपने घर को जलाना नहीं चाहता. सब कुछ तुरंत पा लेने की ललक. पार्टी, विचारधारा, राजनीति, घोषणापत्र, कार्यक्रम, सिद्घांत सब बाजार तय कर देता है. संविधान संशोधन के बिना अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पद्घति आपके सिर पर है. पार्टी नहीं मुङो चुनिए, स्वयंसेवक की साधना का स्वर सुनना ही पड़ेगा. संवाद, बहस सब बेकार. संवादहीनता के सन्नाटे में समाज संसद उघ्र्व सांस ले रही है. दो घूंट जल से सूखे गले को तर करने की जरूरत है. अंजुली भर नीर से समाज को बचाइये. तभी राजनीति, संसद, राष्ट्र और पूरी मानवता बचेगी. तटस्थ रहनेवाला इतिहास में अपराधी होता है. अन्यथा इतिहास किसी को क्षमादान नहीं देता. समय के भ्रमजाल को तोड़ना होगा.

कैसा समय है यह, जब भेड़िये ने हथिया ली है सारी मशालें, और हम निहत्थे खड़े हैं. अरुण कमल कहते हैं : कौन बनेगा पीएम लगा लो सट्टा, काटेगा कौन गंड़ासा या कट्टा.

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