Sugar price surge : आखिर क्यों हो रही मिठास महंगी, क्या त्योहारी सीजन में कम होंगी चीनी की कीमतें !

केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 21 अगस्त की शाम प्रेस सूचना ब्यूरो के माध्यम से देश को बताया कि 'त्योहारी मौसम में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों में वृद्धि को रोकने के लिए सरकार ने जरूरी कदम उठाये हैं.' देश भर में इथेनॉल के चलते चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी की खबर सुर्खियों में आने के बाद सरकार ने यह विज्ञप्ति जारी की. लगातार बढ़ रही चीनी की कीमतों का असली कारण इथेनॉल है या कुछ और, जानें कृषि विशेषज्ञ हरवीर सिंह से...

Sugar price surge : बीते वर्ष 20 अगस्त को चीनी की कीमत 46.3 रुपये प्रति किलोग्राम थी और 2026 की जुलाई में 2 रुपये की बढ़ते के साथ यह 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम रही और 20 अगस्त, 2026 को खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 55.7 रुपये प्रति किलोग्राम हो गयी, यानी सिर्फ एक महीने में 7.52 रुपये प्रति किलोग्राम या लगभग 15.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई. स्थानीय खुदरा बाजार में कई शहरों में रिटेल दुकानें 60 से 70 रुपये प्रति किग्रा तक चीनी बेच रही हैं. हालात ऐसे बन गये हैं कि करीब एक दशक बाद भारत फिर से चीनी आयात करेगा. चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को इथेनॉल उत्पादन से जोड़कर देखा जा रहा है. विपक्ष का कहना है कि गन्ने की फसल को इथेनॉल उत्पादन के लिए मोड़ने से कीमतों में वृद्धि हुई है. लेकिन, यह पूरा सच नहीं है.

आकलन और वास्तविकता में अंतर

चालू पेराई सीजन 2025-26 (1 अक्तूबर, 2025 से 30 सितंबर, 2026) के दौरान चीनी उद्योग ने बंपर उत्पादन के अनुमान जारी किये. इसके मुताबिक देश में 349 लाख टन सकल चीनी उत्पादन, जिसमें इथेनॉल के लिए डायवर्जन भी शामिल था, का अनुमान लगाया गया. इसमें कृषि मंत्रालय की ओर से गन्ने के क्षेत्रफल और फसल उत्पादन के अनुमान भी एक बड़ा आधार रहे. निजी चीनी मिलों के संगठन इस्मा का अनुमान था कि 34 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल के लिए करने के बाद भी देश में 315 लाख टन चीनी उपलब्ध होगी. यह मात्रा घरेलू खपत से करीब 30 लाख टन अधिक थी. इसके अलावा 2024-25 पेराई सीजन का 50 लाख टन चीनी का बकाया स्टॉक भी था. ऐसे में कागजों पर स्थिति एकदम सामान्य थी. खाद्य मंत्रालय का चीनी निदेशालय और खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग इसे ही सही मानकर चल रहा था. इसी के चलते चालू सीजन में 7 नवंबर, 2025 को 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दे दी गयी.

निर्यात कोटा बढ़ने से उपजा संकट

जनवरी, 2026 में ही देश में गन्ने की कमजोर फसल के चलते चीनी उत्पादन अनुमान से काफी कम रहने की स्थिति बन गयी थी. फरवरी के अंत में गन्ना उत्पादन में आयी कमी के चलते महाराष्ट्र में चीनी मिलें बंद होने लगीं, लेकिन इसी दौरान 13 फरवरी, 2026 को सरकार की ओर से पांच लाख टन अतिरिक्त चीनी निर्यात की अनुमति दे दी गयी और निर्यात कोटा बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया. बेहतर उत्पादन का अनुमान इन नीतिगत फैसलों का आधार बने और इस बीच गन्ने के रस और बी-हैवी मोलेसेज से इथेनॉल का उत्पादन भी जारी रहा. हालांकि, चीनी की बेहतर कीमतों का फायदा मिलने के चलते कई चीनी मिलें इथेनॉल उत्पादन को लेकर सुस्त रहीं. इसके चलते 34 लाख टन के शुरुआती अनुमान के मुकाबले करीब 30 लाख टन चीनी का ही उपयोग इथेनॉल के लिए हुआ.

उत्पादन में कमी भी एक बड़ी वजह

अब बात वास्तविक उत्पादन की. 315 लाख टन चीनी उत्पादन के अनुमान के मुकाबले वास्तविक उत्पादन 279 लाख टन पर थम गया. पिछले साल का बकाया स्टॉक 50 लाख टन था, लेकिन इसमें उपयोग के लायक केवल 48 लाख टन चीनी ही थी, यानी पूरे सीजन के लिए कुल 327 लाख टन चीनी उपलब्ध थी. वैश्विक बाजार में कम कीमतें होने के कारण 20 लाख टन के निर्यात कोटे में से केवल 8 लाख टन चीनी ही निर्यात हो सकी. यदि पूरा कोटा निर्यात हो जाता, तो घरेलू स्थिति और गंभीर हो सकती थी. सरकार की ओर से 13 मई को उत्पादन में अनुमान के मुकाबले भारी गिरावट साफ होने के करीब एक माह बाद निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया.

संकट के मूल में है गन्ने की पैदावार में गिरावट

तमाम वजहें अपनी जगह हैं, पर इस संकट की जड़ में सबसे बड़ी वजह है गन्ना उत्पादन में गिरावट, जिसे स्वीकार करना होगा. महाराष्ट्र और कर्नाटक में इस साल बेहतर चीनी उत्पादन का अनुमान था, लेकिन सितंबर-अक्तूबर, 2025 में हुई भारी बारिश के चलते करीब एक माह तक गन्ने की फसल पानी में खड़ी रही, जिससे उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा. पिछले साल की तरह इस साल भी जनवरी में फसल में फ्लावरिंग होने लगी, जिससे सुक्रोज कंटेंट में कमी आ गयी. महाराष्ट्र की चीनी मिलें तेजी से बंद होने लगीं और सरकारी आंकड़ों के आधार पर अनुमानित गन्ना उत्पादन का 60 फीसदी भी मिलों तक पेराई के लिए नहीं पहुंचा, तब भी स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया गया. उत्तर प्रदेश में करीब एक दशक तक बंपर उत्पादन देने वाली गन्ने की सीओ 0238 किस्म लगातार रोग की चपेट में रही, नतीजतन यहां गन्ने के क्षेत्रफल में गिरावट आयी और किसानों ने दूसरी फसलों की ओर रुख किया, जिनमें मक्का और पॉपुलर प्लांटेशन प्रमुख हैं. साथ ही, चालू सीजन में यूपी में दो साल बाद गन्ने का दाम बढ़ाया गया, जबकि इस दौरान किसानों की लागत लगातार बढ़ती रही. इसका भी असर गन्ने से किसानों के मोहभंग के रूप में सामने आया. सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल महाराष्ट्र में भी उत्पादन अनुमान से काफी कम रहा. 

व्यापारियों को था कीमतें बढ़ने का अंदाजा

अब 327 लाख टन में से 8 लाख टन निर्यात के बाद 319 लाख टन चीनी बची. घरेलू खपत करीब 285 लाख टन है, यानी चालू सीजन के अंत में बकाया स्टॉक करीब 34 लाख टन रह जायेगा, जो पिछले कई दशकों का सबसे निचला स्तर है. उद्योग और व्यापार, दोनों को इस बात का अंदाजा था कि चीनी का स्टॉक रिकॉर्ड स्तर तक नीचे जाने वाला है और जून के बाद कीमतों में तेजी आयेगी. मई-जून में जो एक्स-मिल कीमतें 3,900 रुपये से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच थीं, उनमें जुलाई से उफान आना शुरू हो गया. नतीजा सामने है कि एक्स-मिल दाम 5,700 रुपये प्रति क्विंटल को पार कर गया है.

आयात के फैसले में देरी का दिखेगा असर

कीमतें बढ़ने पर खाद्य मंत्रालय ने चीनी पर स्टॉक लिमिट लगायी और 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का फैसला किया. हालांकि, इसे लागू करने में कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं. कांडला रिफाइनरी को घरेलू बाजार में बिक्री की अनुमति देना और मिलों द्वारा रिफाइनिंग करना आसान नहीं है. ब्राजील से आपूर्ति में लगने वाले समय को देखते हुए, यदि हाइ-सी पर तुरंत खरीदारी नहीं हुई, तो चीनी त्योहारों तक नहीं पहुंच पायेगी और खुदरा कीमतें नया रिकॉर्ड बना सकती हैं.

आगामी सीजन में मंडरा रहा अलनीनो का खतरा        

इस वर्ष अगर अलनीनो के असर के चलते मानसून कमजोर रहता है, तो आगामी सीजन 2026-27 में भी चीनी उत्पादन को झटका लग सकता है. उद्योग के जानकारों का कहना है कि गन्ने के बुवाई क्षेत्र, फसल की स्थिति और मानसून को देखते हुए अगले साल देश में चीनी का सकल उत्पादन करीब 310 लाख टन रह सकता है. इसमें से करीब 25 लाख टन चीनी का इथेनॉल के लिए डायवर्जन होने पर शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 285 लाख टन रह सकता है. हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में अगले सीजन में इथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्जन की संभावना अब लगभग समाप्त हो गयी है. 

कितनी चीनी लेता है इथेनॉल
भारत के कुल चीनी उत्पादन लगभग 310–330 लाख टन का लगभग 9 से 12 प्रतिशत हिस्सा ही इथेनॉल बनाने के लिए उपयोग किया जाता है. सरकार द्वारा चलाये जा रहे इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत गन्ने के अलावा अन्य अनाज का उपयोग बढ़ा है. गन्ना व शीरा : कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा अब गन्ने के रस, बी-हेवी और सी-हेवी मफिन/शीरे से बनता है.   अनाज : वर्तमान में लगभग 70 से 75 प्रतिशत इथेनॉल अनाज, खासतौर पर मक्का, खराब या टुकड़ा चावल से तैयार किया जाता है.  


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By Preeti Singh Parihar

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