स्टेज और संसद का फ़र्क़ समझिए. मंच की रौशनी और संसद की जिम्मेदारी में जमीन-आसमान का अंतर है. एक जगह आपको कुछ घंटे भीड़ का मन बहलाना होता है; दूसरी जगह पूरी एक पीढ़ी का भविष्य गढ़ना होता है. मंच पर ग़लती हुई तो परदा गिर जाता है और तालियां भुला देती हैं; पर सदन में लिया गया एक ग़लत फ़ैसला करोड़ों ज़िंदगियों पर सालों भारी पड़ता है. अफ़सोस यह है कि हमारी राजनीति ने यह बुनियादी फ़र्क़ ही मिटा दिया है – जिसने जितनी ज़्यादा भीड़ खींची, उसे उतनी जल्दी टिकट थमा दिया गया.
भांड को संसद भेजोगे तो नौटंकी ही मिलेगी. जिस आदमी की पूंजी केवल लोकप्रियता और तमाशा हो, उससे गंभीर नीति, दूरदृष्टि और कानून की समझ की उम्मीद क्यों पाली जाए? पर्दे पर चमकना अलग हुनर है, और बजट के आँकड़ों, किसान की पीड़ा, या किसी विधेयक की बारीकियों को समझना बिल्कुल अलग साधना. कला अपनी जगह आदरणीय है – उस पर कोई उँगली नहीं उठा रहा. लेकिन ग्लैमर को योग्यता का प्रमाणपत्र मान लेना लोकतंत्र के साथ सरासर धोखा है. हम चेहरे की चमक देखकर मुग्ध हो जाते हैं, और यह पूछना भूल जाते हैं कि इस चमक के पीछे कोई सोच, कोई नीयत, कोई काबिलियत भी है या नहीं.
असली सवाल कलाकार से नहीं, मतदाता से पूछा जाना चाहिए. हम वोट किस आधार पर देते हैं – चेहरे की चमक पर, फ़ैन-फ़ॉलोइंग की गिनती पर, किसी गीत या संवाद की खुमारी पर; या उस काम पर जो वह पांच साल सदन में करेगा? जो जनता रील देखकर बटन दबाती है, रिकॉर्ड देखकर नहीं, वह अपनी ही किस्मत के साथ जुआ खेलती है. और जो जनता चुनाव के बाद अपने प्रतिनिधि से हिसाब नहीं मांगती, वह दरअसल अपनी ही गुलामी पर खुद हस्ताक्षर करती है.
लोकतंत्र पांच साल में एक बार बजने वाली घंटी नहीं है – यह रोज़ की जागरूकता है, सवाल पूछने का साहस है, और भीड़ के साथ बहने से इनकार करने की रीढ़ है. राजा आसमान से नहीं टपकता; वह हमारी ही शक्ल का होता है, हमारी ही पसंद का आईना होता है.
इसलिए अगली बार बटन दबाने से पहले ठहरकर सोचिए – आप मनोरंजन चुन रहे हैं या क़ानून बनाने वाला? नाच-गाना देखकर चुनेंगे तो नौटंकी मिलेगी; सोच-समझकर चुनेंगे तो विमर्श. बदलाव मंच से नहीं आएगा – वह वोट देने वाले की कसौटी से शुरू होगा.
चेयरमैन- भारत उत्थान संघ, खाना चाहिए फाउंडेशन, महाराणा प्रताप फाउंडेशन
