पतंगबाजी सिर्फ एक खेल नहीं है, बल्कि इसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम से गहरा ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है. साल 1928 में जब साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था, तब आंदोलनकारियों ने संदेश फैलाने के लिए पतंगों का सहारा लिया था. 'साइमन गो बैक' (साइमन वापस जाओ) जैसे नारे पतंगों पर लिखकर हवा में उड़ाए जाते थे. पुलिस की पाबंदियों और तंग गलियों से ऊपर उठकर पतंगें दूर-दूर तक विरोध का संदेश पहुंचाती थीं. उस दौर में आसमान, भारतीयों के लिए प्रतिरोध दर्ज कराने का एक खुला मंच बन गया था.
पतंगबाजी: 1947 के बाद बदला स्वरूप, बनी जश्न-ए-आजादी का हिस्सा
1947 में मिली आजादी के बाद, पतंगबाजी का यह संदेश धीरे-धीरे उत्सव में बदल गया. अब यह खेल राष्ट्रीय एकता और आजादी की भावना का जीवंत प्रतीक है. बाजारों में तीन रंगों वाली पतंगें, देशभक्ति के संदेश, राष्ट्रीय नायकों की तस्वीरें और सामाजिक अभियानों से जुड़ी रंग-बिरंगी पतंगें पटी पड़ी हैं. दिल्ली टूरिज्ज्म से लेकर गुजरात के अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव तक, यह परंपरा भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.
छतों पर जुड़ता है परिवार, सजती हैं महफिलें
15 अगस्त के दिन घर की छतें किसी उत्सव स्थल से कम नजर नहीं आतीं. परिवार के सदस्य एक साथ जमा होते हैं, संगीत बजता है, स्वादिष्ट पकवान बनते हैं और 'काटो-काटो' के शोर के बीच पतंगें काटी जाती हैं. एक पतंग के कटते ही पूरी छत तालियों और ठहाकों से गूंज उठती है.
