कावेरी जल विवाद फिर गरमाया: कर्नाटक ने पानी छोड़ने से किया इनकार, जानिए 130 साल पुराने विवाद की पूरी कहानी

कावेरी नदी जल विवाद एक बार फिर गरमा गया है, जहाँ कर्नाटक ने कम बारिश का हवाला देते हुए तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने से इनकार कर दिया है. यह विवाद 130 साल पुराना है और हर सूखे साल में गहरा जाता है.

Cauvery Water Dispute : कावेरी नदी का पानी एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद की वजह बन गया है. कम बारिश का हवाला देते हुए कर्नाटक ने कहा है कि उसके पास पीने के पानी की भी कमी है, इसलिए फिलहाल तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना संभव नहीं है. भाजपा सांसद और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर ने कहा कि राज्य 'डिस्ट्रेस फॉर्मुला' (सूखे की स्थिति में लागू व्यवस्था) के तहत राहत चाहता है और केंद्र व संबंधित प्राधिकरणों सेइस पर विचार करने की अपील की गई है.

शेट्टर ने कहा कि अगर पर्याप्त बारिश होती तो स्थिति अलग होती. उनका यह भी आरोप है कि राज्य सरकार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और अन्य मंचों पर अपने पक्ष को पर्याप्त तथ्यों और आंकड़ों के साथ नहीं रख पाई. उन्होंने सुझाव दिया कि ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सभी तथ्य रखे जाएं.

वहीं, प्राधिकरण ने अपने पुराने आदेश पर ही मुहर लगाई और 15 दिनों तक रोजाना 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को देने का निर्देश बरकरार रखा. इसी बीच कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष और विधायक बी.वाई. विजेंद्र ने कहा था कि शुक्रवार यानि आज मांड्या में बड़े प्रदर्शन करेंगे.

हर कुछ साल में क्यों भड़कता है विवाद?

कावेरी नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी तक जाती है. नदी का ऊपरी हिस्सा कर्नाटक में है, जबकि निचला हिस्सा तमिलनाडु में पड़ता है. इसलिए जब भी हारिश कम होती है, कर्नाटक अपने बांधों में मौजूद पानी को पहले पीने और स्थानीय जरूरतों के लिए सुरक्षित रखना चाहता है. दूसरी ओर तमिलनाडु का कहना है कि उसकी खेती और लाखों किसानों की आजीविकाकावेरी के पानी पर निर्भर है, इसलिए तय हिस्से का पानी मिलना ही चाहिए. यही वजह है कि लगभग हर सूखे या कमजोर मानसून वाले साल में दोनों राज्यों के बीच टकराव बढ़ जाता है.

130 साल पुराना है कावेरी जल विवाद

कावेरी जल विवाद ब्रिटिश शासन के दौरान 1892 में हुई थी. उस समय मैसूर रियासत (वर्तमान कर्नाटक) और मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु) के बीच पहला समझौता हुआ. इसमें तय किया गया कि ऊपरी हिस्से में कोई बड़ी सिंचाई परियोजना शुरू करने से पहले निचले हिस्से की सहमति ली जाएगी.

इसके बाद 1924 में ब्रिटिश सरकार की मध्यस्थता से नया समझौता हुआ, जिसकी अवधि 50 साल तय की गई. इसी दौरान कृष्णराज सागर (KRS) और मेट्टूर बांध जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं का रास्ता साफ हुआ.

1974 के बाद बढ़ा टकराव

1924 का समझौता 1974 में खत्म हो गया. इसके बाद कर्नाटक ने नए बांध और सिंचाई परियोजनाएं शुरू करनी शुरू कर दीं. तमिलनाडु ने इसका विरोध किया और मामला लगातार गंभीर होता गया. कर्नाटक का कहना था कि पुराना समझौता उसके साथ न्याय नहीं करता था, जबकि तमिलनाडु का तर्क था कि उसकी खेती दशकों से कावेरी के पानी पर निर्भर है.

1990 में बना ट्रिब्यूनल

विवाद बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने 2 जून 1990 को कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन किया. करीब 17 साल की सुनवाई के बाद 2007 में ट्रिब्यूनल ने पानी के बंटवारे का फैसला सुनाया.

उस समय 740 TMC (Thousand Million Cubic Feet) उपलब्ध पानी का बंटवारा इस प्रकार किया गया था-

  • तमिलनाडु: 419 TMC
  • कर्नाटक: 270 TMC
  • केरल: 30 TMC
  • पुडुचेरी: 7 TMC

हालांकि दोनों राज्यों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.

2018 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया. अदालत ने कर्नाटक की पेयजल जरूरतों, खासकर बेंगलुरु शहर की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए उसका हिस्सा 14.75 TMC बढ़ा दिया.

संशोधित आवंटन इस प्रकार हुआ-

  • कर्नाटक: 284.75 TMC
  • तमिलनाडु: 404.25 TMC
  • केरल: 30 TMC
  • पुडुचेरी: 7 TMC

साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) बनाने का निर्देश दिया, ताकि पानी के बंटवारे की निगरानी की जा सके.

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अभी क्या है विवाद?

इस साल कर्नाटक का कहना है कि राज्य में बारिश सामान्य से कम हुई है. ऐसे में जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं है और राज्य अपने लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दे रहा है. इसलिए तमिलनाडु को निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ना फिलहाल संभव नहीं है. दूसरी ओर तमिलनाडु का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और तय नियमों के अनुसार उसे उसका हिस्सा मिलना चाहिए. यानी, कावेरी विवाद की जड़ आज भी वही है- कम बारिश होने पर सीमित पानी का बंटवारा किस आधार पर किया जाए. सामान्य मानसून वाले वर्षों में यह विवाद अपेक्षाकृत शांत रहता है, लेकिन जैसे ही सूखे या बारिश की कमी की स्थिति बनती है, दोनों राज्यों के बीच टकराव फिर तेज हो जाता है.


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By आलोक पाठक

आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।

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