मतदाताओं को रिश्वत देने को लेकर आरोपित उम्मीदवारों की सदस्यता रद्द हो :चुनाव आयोग

नयी दिल्ली : मतदाताओं को लुभाने को लेकर जो उम्मीदवार आरोपपत्रों में नामजद हैं, चुनाव आयोग जल्द ही सरकार को उनकी सदस्यता पांच साल तक के लिए रद्द करने को कहेगा. तमिलनाडु विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘नये तरीकों’ के पाये जाने के बाद यह कदम उठाया गया है. आयोग में मौजूद […]

नयी दिल्ली : मतदाताओं को लुभाने को लेकर जो उम्मीदवार आरोपपत्रों में नामजद हैं, चुनाव आयोग जल्द ही सरकार को उनकी सदस्यता पांच साल तक के लिए रद्द करने को कहेगा.

तमिलनाडु विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘नये तरीकों’ के पाये जाने के बाद यह कदम उठाया गया है. आयोग में मौजूद सूत्रों ने बताया कि चुनाव निगरानी संस्था ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में बदलाव की मांग करते हुए कानून मंत्रालय को पत्र लिखने का फैसला किया है.

इसके पीछे यह उद्देश्य है कि अदालत में किसी उम्मीदवार के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद उसे पांच साल तक के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया जाये. इस महीने की शुरुआत में आयोग ने जब पाया कि आरके नगर विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए धन का इस्तेमाल किया गया, तब आयोग ने उपचुनाव अनिश्चित काल के लिए रद्द कर दिया था. उपचुनाव 12 अप्रैल को होना था.

जे जयललिता की मृत्यु के बाद तमिलनाडु विधानसभा की इस सीट पर उपचुनाव कराने की जरूरत पड़ी थी. अपने लंबे आदेश में आयोग ने इस बात की ओर इशारा किया था कि राजनीतिक पार्टियों और उनके शीर्ष नेताओं ने आरके नगर विधानसभा उपचुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘‘नये तरीकों’ का इस्तेमाल किया, ताकि चुनाव खर्च पर नजर रख रहे कानून प्रवर्तन अधिकारियों को चकमा दिया जा सके.

दरअसल, मतदाताओं को लुभाने के लिए नकद, उपहार, टोकन, प्रीपेड फोन रिचार्ज कूपन, अखबारों का सब्सक्रिप्शन, दूध का टोकन, बैंक खातों में धन का अंतरण और यहां तक कि मोबाइल नंबरों पर मोबाइल वैलेट भुगतान करने की शिकायतें चुनाव आयोग को मिली थी. इससे पहले, चुनाव आयोग ने सरकार से चुनाव कानून के तहत वह शक्तियां देने के लिए कहा है, जहां वह धन के इस्तेमाल वाले चुनाव को रद्द कर सके.

अभी, आयोग सिर्फ बाहुबल के इस्तेमाल वाले चुनाव को रद्द कर सकता है. यह धन बल का इस्तेमाल होने पर किसी चुनाव को अनुच्छेद 324 के तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर रद्द कर सकता है, लेकिन यह चाहता है कि यह शक्ति कानून के तहत निहित की जाये. तर्क यह है कि यह अपनी संवैधानिक शक्तियों का अक्सर इस्तेमाल नहीं करना चाहता.

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