प्रमोशन में आरक्षण मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खड़े किये प्रश्‍न

नयी दिल्ली : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रश्‍न खड़े किये हैं. कोर्ट ने कहा कि यदि एक आदमी रिजर्व कैटिगरी से आता है और राज्य का सेक्रेटरी है, तो क्या ऐसे में क्या ये तार्किक होगा कि उसके परिजन को […]

नयी दिल्ली : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रश्‍न खड़े किये हैं. कोर्ट ने कहा कि यदि एक आदमी रिजर्व कैटिगरी से आता है और राज्य का सेक्रेटरी है, तो क्या ऐसे में क्या ये तार्किक होगा कि उसके परिजन को रिजर्वेशन के लिए बैकवर्ड मान लिया जाए. दरअसल, सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की खण्डपीठ इस बात का आकलन कर रही है कि क्या क्रीमी लेयर के सिद्धांत को एससी-एसटी के लिए लागू करना चाहिए, जो फिलहाल सिर्फ ओबीसी के लिए लागू है.

गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रश्‍न भी खड़ा किया कि मान लिया जाए कि एक जाति 50 सालों से पिछड़ी है और उसमें एक वर्ग क्रीमी लेयर में आ चुका है, तो ऐसी स्थितियों में क्या किया जाना उचित होगा ? कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आरक्षण का पूरा सिद्धांत उन लोगों को मदद देने के लिए है, जो कि सामाजिक रूप से पिछड़े हैं और वो खुद में सक्षम नहीं हैं. ऐसे में इस पहलू पर विचार करना अति आवश्‍यक है.

यदि आपको याद हो तो इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हुई पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि 2006 के नागराज जजमेंट के चलते एसटी-एससी के लिए प्रमोशन में आरक्षण रुक गया है. केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रमोशन में आरक्षण देना उचित है या अनुचित इसपर कमेंट नहीं करना चाहता, लेकिन यह तबका 1000 से अधिक सालों से समस्या झेलता रहा है. उन्होंने कहा कि नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को फैसले की समीक्षा की आवश्‍यकता है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >