नयी दिल्ली: जम्मू कश्मीर में लागू अनुच्छेद 35ए पर एक बार फिर विवाद शुरू हो गया है. आज इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है. शीर्ष अदालत में इसकी वैधता को चुनौती दी गयी है. उधर, इसकी वैधता पर खतरे की आशंका के मद्देनजर अलगाववादियों ने घाटी में बंद बुलाया है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि अनुच्छेद 35ए आखिर है क्या?
अनुच्छेद 35ए शुरू से भारतीय संविधान में शामिल नहीं था. इसे 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आदेश पर जोड़ा गया. इसे लागू करने के लिए तत्कालीन सरकार ने धारा 370 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग किया, जिसका भाजपा सैद्धांतिक विरोध करती रही है.
धारा 35 ए ने जम्मू कश्मीर में एकऐसा वर्ग तैयार कर दिया है, जो वहां का स्थायी नागरिक नहीं है और आधी सदी से भी अधिक लंबे अरसे से रिफ्यूजी की हैसियत से रह रहा है. हालात यह है कि उस समुदाय के लोग देश का प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर की किसी पंचायत का प्रधान नहीं. इस धारा की प्रासंगिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करने वाला है.
प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया था लागू
अनुच्छेद 35ए को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लागू किया था. इसे 15 मई 1954 को एक आदेश के तहत लागू किया गया था. इस धारा को संविधान की धारा के 370 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों के तहत लागू किया गया था. अनुच्छेद 35ए जम्मू कश्मीर सरकार व वहां की विधानसभा को वहां का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देता है. इस धारा के तहत 1956 में जम्मू कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी गयी.
इसके तहत यह व्यवस्था की गयी कि जम्मू कश्मीर का नागरिक वही होगा जो 14 मई 1954 से पहले राज्य का नागरिक रहा हो या इससे पहले दस सालों से वहां रहा रहा हो. साथ ही उसके पास राज्य में संपत्ति हो. इन प्रावधानों ने 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से विस्थापित होकर जम्मू कश्मीर में आये लोगों की नागरिकता का अधिकार छीन लिया. चूंकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर ही हुआ था और ऐसे में वहां से अधिसंख्या विस्थापित हिंदू ही थे. एक आंकड़े के अनुसार, 5764 परिवार जम्मू पाकिस्तान से विस्थापित होकर आये थे. इसमें 80 प्रतिशत हिंदू थे.
इसके तहत प्रावधान है कि जो परिवार एक मार्च 1947 के पहले जम्मू कश्मीर छोड़ आज के पाकिस्तान सीमा के अंदर चले गये, लेकिन वापस रीसेटलमेंट परमिट से आये हों, उन्हें स्थायी नागरिक माना जाएगा. यानी जिनके पास रीसेटलमेंट परमिट नहीं है या फिर वे एक मार्च 1947 के पहले पाकिस्तान सीमा में चले गये, उन्हें नागरिक नहीं माना जाएगा. यानी पाकिस्तान सीमा में स्थायी रूप से बसे हिंदू परिवार ही इस धारा के जटिल प्रावधानों में ज्यादातर फंसे, क्योंकि वही धर्म के आधार पर देश बंटवारे के बाद इस ओर आये.
जम्मू कश्मीर के इस समुदाय की स्थिति म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों जैसी हो गयी, जिन्हें वहां के नये नागरिकता कानून के तहत नागरिक मानने से इनकार कर दिया गया था और वे वहां के वोटर नहीं रहे और न ही किसी अन्य तरह के अधिकार मिले.
चूंकि ये विस्थापित थे और 1954 के हिसाब से सात साल पहले ही जम्मू कश्मीर में आये थे, इसलिए वे वहां के स्थायी निवासी नहीं घोषित हुए. इस दौरान पाकिस्तान से आये वैसे लोग जो भारत के अन्य दूसरे राज्यों में जा बसे, उन्हें स्थायी निवासी का दर्जा भी मिली और वो तमाम अधिकार जो पहले से इस भूभाग पर रहे रहे थे.
लेकिन, जम्मू कश्मीर में उन लोगों की आज तीसरी व चौथी पीढ़ी भी रिफ्यूजी ही है. वे राज्य विधानसभा चुनाव व निकाय चुनाव में वोट नहीं कर सकते हैं और न ही संपत्ति खरीद सकते हैं. वे देश के लोकसभा चुनाव में वोट जरूर कर सकते हैं, क्योंकि भारत उन्हें अपना नागरिक मानता है. ऐसे में वे जम्मू कश्मीर की किसी पंचायत का प्रधान व मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, लेकिन भारत के शीर्ष पदों पर अवश्य पहुंच सकते हैं.
इन लोगों को राज्य में नौकरियां नहीं मिलती हैं और सरकारी शिक्षण संस्थानों में नामांकन भी नहीं होता है. कुल मिलाकर जम्मू कश्मीर में उनकी वही स्थिति है, जो म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की. हालांकि उनके लिए थोड़ी राहत की बात यह है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत उन्हें सारे अधिकार देता है.
कश्मीर में विरोध
आर्टिकल 35 ए को हटाने का जम्मू कश्मीर के कई समूह तीखा विरोध करते रहे हैं. यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री व नेशनल कान्फ्रेंस के नेता फारुख अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि इस धारा को हटाने से राज्य में जन विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. सैयद अली शाह गिलानी एवं मीर वाइज फारुख जैसे अलगाववादी इसका मुखर विरोध करते रहे हैं.
आदेश को चुनौती देने वालों का क्या है तर्क
धारा 35ए को चुनौती देने वालों का तर्क है कि यह आदेश चूंकि राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया था, इसलिए इसकी वैधानिकता संदिग्ध है. क्योंकि संविधान में प्रावधान बनाने, हटाने या जोड़ने का अधिकार संसद को है और वह भी संविधान संशोधन की प्रक्रिया के द्वारा. हालांकि प्रथम राष्ट्रपति ने संविधान की धारा 370 के तहत ही इस तरह के आदेश दिये थे. इनकी मांग है कि एेसे में इसे हटाना चाहिए, जिस पर शीर्ष अदालत को विचार करना है. अगर इस धारा को हटाया जाता है तो इसके बाद जिन्हें आज रिफ्यूजी कहा जाता है उन्हें प्रोपर्टी खरीदने व नौकरी मिलने का रास्ता साफ हो जायेगा. साथ ही वे वहां के स्थायी नागरिक भी हो जायेंगे और स्थानीय चुनाव में भाग ले सकेंगे.
