एसआइआर : महिला मतदाताओं की संख्या में आयी मामूली कमी

यह बदलाव करीबी मुकाबले वाले नि‍र्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को प्रभावित कर सकता है

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) ने एक नया राजनीतिक आयाम जोड़ दिया है. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या में मामूली कमी आयी है. विश्लेषकों का कहना है कि यह बदलाव करीबी मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में परिणामों को प्रभावित कर सकता है. राज्य के लगभग आधे मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला मतदाता, जो पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में मतदान करने निकलती हैं, पिछले एक दशक में राज्य की राजनीति में सबसे निर्णायक चुनावी समूह के रूप में उभरी हैं. एकजुट रूप से मतदान करने के पैटर्न, मतदान में लगातार वृद्धि और कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित राजनीतिक लामबंदी के साथ, महिला मतदाता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी जीत में अहम भूमिका निभाती रही हैं. ऐसे में भाजपा इस वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास कर रही है. एसआइआर के बाद के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं की संख्या लगभग 3.44 करोड़ है, जो नवंबर में प्रक्रिया शुरू होने पर 3.77 करोड़ थी. वहीं, पुरुष मतदाताओं की संख्या 3.89 करोड़ से घटकर 3.60 करोड़ रह गयी है. कुल मिलाकर राज्य के 7.04 करोड़ मतदाताओं में से लगभग आधी महिलाएं हैं. महिला मतदाताओं की संख्या में 8.7 प्रतिशत की कमी आयी है, जो पुरुष मतदाताओं की संख्या में लगभग 7.5 प्रतिशत की गिरावट से मामूली रूप से अधिक है. पिछले दो दशकों के मतदान के आंकड़े महिलाओं के बढ़ते राजनीतिक महत्व को रेखांकित करते हैं. 2006 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 80.75 था, जो 2011 में बढ़कर 84.45 प्रतिशत हो गया, 2016 में 94.42 प्रतिशत तक पहुंच गया और 2021 में एक बार फिर पुरुषों की भागीदारी से थोड़ा अधिक रहा, जहां महिलाओं का मतदान प्रतिशत 81.75 था, जबकि पुरुषों का 81.37 प्रतिशत था. बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के सर्वेक्षण आधारित अनुमानों से पता चलता है कि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने महिलाओं के 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किये, जबकि भाजपा ने लगभग 37 प्रतिशत वोट प्राप्त किये. राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, कि महिला मतदाताओं की संख्या में किसी भी प्रकार की कमी, भले ही वह मामूली हो, उन सीटों पर असर डाल सकती है, जहां कड़ी टक्कर होती है और जहां मतदान में अंतर अक्सर नतीजों को निर्धारित करता है. अर्थशास्त्रियों ने इस प्रवृत्ति को ‘दीदी प्रभाव’ बताया है, जिसमें ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और महिला केंद्रित कल्याणकारी कार्यक्रमों की साझा भूमिका है.

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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